बचपन से जल प्रहरी, पंचायत से जल लोकतंत्र वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक, न्यायिक और वैश्विक दृष्टिकोण से जल आत्मनिर्भर भारत 2047
बचपन से जल प्रहरी, पंचायत से जल लोकतंत्र वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक, न्यायिक और वैश्विक दृष्टिकोण से जल आत्मनिर्भर भारत 2047

बचपन से जल प्रहरी, पंचायत से जल लोकतंत्र

वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक, न्यायिक और वैश्विक दृष्टिकोण से जल आत्मनिर्भर भारत 2047

अजय सहाय

भारत में जल संकट एक बहुआयामी चुनौती बन चुका है जिसे केवल सरकारी योजनाओं या तकनीकी उपायों से हल नहीं किया जा सकता बल्कि इसके लिए समाज के हर वर्ग की सहभागिता, बच्चों से लेकर पंचायतों तक, वैज्ञानिकों से लेकर न्यायपालिका तक, और देश से लेकर अंतरराष्ट्रीय अनुभवों तक, सभी को जोड़कर एक व्यापक जल प्रबंधन ढाँचा तैयार करना होगा ।

वैज्ञानिक रूप से देखें तो भारत में प्रतिवर्ष लगभग 4000 अरब घन मीटर (BCM) वर्षा जल गिरता है जिसमें से केवल 1100 BCM जल ही उपयोग योग्य बन पाता है जबकि शेष लगभग 2900 BCM जल समुद्रों और नदियों के रास्ते बहकर नष्ट हो जाता है, और यही कारण है कि देश की 18% जनसंख्या को मात्र 4% वैश्विक मीठे जल संसाधनों पर निर्भर रहना पड़ता है।

इस परिदृश्य में बच्चों की मनोवैज्ञानिक क्षमता और जल पंचायतों का सामुदायिक ढाँचा निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि मनोवैज्ञानिक शोध स्पष्ट करते हैं कि 8 से 12 वर्ष की आयु में डाली गई आदतें जीवनभर बनी रहती हैं और यदि इस उम्र में बच्चों को जल संरक्षण, नल बंद करना, पौधारोपण करना, वेटलैंड्स की रक्षा करना, और वर्षा जल संचयन के महत्त्व को सिखाया जाए तो वे जीवनभर “जल प्रहरी” बने रहते हैं ।  

अनुमान है कि यदि भारत के 15 करोड़ स्कूली बच्चे प्रतिदिन केवल 1 लीटर पानी बचाएँ तो वर्ष भर में 5.4 अरब लीटर जल की बचत हो सकती है, यह आँकड़ा दर्शाता है कि बच्चों की छोटी-छोटी आदतें भी बड़े परिणाम ला सकती हैं; इसीलिए विद्यालयों को जल प्रयोगशाला (Water Laboratory) बनाने पर जोर दिया जा रहा है, जैसे मुजफ्फरपुर जिले में कई स्कूलों में छत पर वर्षा जल संचयन की व्यवस्था कर बच्चों को यह गणना कराई गई कि 100 वर्ग मीटर की छत से औसतन 80,000 लीटर वर्षा जल संग्रहित किया जा सकता है, ऐसे व्यावहारिक प्रयोग बच्चों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण (scientific temperament) और जिम्मेदारी की भावना दोनों विकसित करते हैं ।

दूसरी ओर पंचायतें जल लोकतंत्र की सशक्त इकाई हैं जो सामुदायिक स्तर पर वार्षिक जल बजट (Water Budget) तैयार करती हैं और यह तय करती हैं कि कितनी वर्षा हुई, कितना जल संरक्षित हुआ और कितना व्यर्थ बहा, उदाहरणस्वरूप यदि किसी पंचायत का क्षेत्रफल 7.29 वर्ग किमी है और औसत वर्षा 1300 मिमी है तो लगभग 95 मिलियन क्यूबिक मीटर वर्षा जल गिरता है, यदि इसका केवल 50% भी संग्रहित किया जाए तो पंचायत अपनी कृषि, घरेलू और पशुपालन आवश्यकताओं के लिए आत्मनिर्भर हो सकती है ।

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के मणिका विष्णुपुर चाँद पंचायत में इसी मॉडल को लागू किया गया जहाँ 30,000 फीट लंबी ट्रेंच, 10 खेत पोखरी, 50 सोख्ता गड्ढे, 20,000 पौधे और लगभग 5 करोड़ लीटर वर्षा जल संचयन हुआ और इसमें बच्चों ने “जल शुभंकर” बनकर नाटक, गीत और रैलियों के माध्यम से पूरे गाँव को जागरूक किया, इस तरह बच्चे और पंचायत का संगम बहुआयामी परिणाम देता है ।

सरकारी योजनाओं जैसे मनरेगा (MGNREGA), अटल भूजल योजना, जल-जीवन-हरियाली, नमामि गंगे और कैच द रेन अभियान को पंचायतों से जोड़कर इस मॉडल को और सशक्त बनाया जा सकता है, जैसे मनरेगा में प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन (NRM) कार्यों के अंतर्गत चेकडैम, पोखर, ट्रेंच और आहर का निर्माण कराया जाता है जो रोजगार के साथ जल संचयन भी सुनिश्चित करता है, वहीं पंचायतें इस पर सामुदायिक स्वामित्व बनाए रखती हैं ताकि परिसंपत्तियाँ उपेक्षित न हों ।

महिला स्वयं सहायता समूहों और युवाओं की भागीदारी से जल पंचायतें और मज़बूत होती हैं क्योंकि जब बच्चे और महिलाएँ साथ खड़े होते हैं तो जल मुद्दों को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलती है; तकनीकी दृष्टि से यदि पंचायतों और बच्चों को ISRO के सैटेलाइट डेटा (Sentinel-1, Landsat-8/9, ICESat-2), जीआईएस मैपिंग, मोबाइल ऐप आधारित जल बजटिंग और ड्रोन सर्वे से जोड़ा जाए तो गाँव डिजिटल जल ज्ञान केंद्र बन सकते हैं; न्यायालयीय दृष्टिकोण से देखें तो उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने 20 मार्च 2017 को गंगा और यमुना नदियों को जीवित इकाई (Living Entity) का दर्जा दिया और कहा कि इनकी रक्षा मनुष्यों की तरह होनी चाहिए, हालाँकि बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश पर रोक लगाई, लेकिन यह फैसला जल संरक्षण की दिशा में न्यायपालिका की गंभीरता को दर्शाता है ।

इसके अतिरिक्त 5 नवम्बर 2008 को तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने गंगा नदी को राष्ट्रीय नदी घोषित करते हुए National Ganga River Basin Authority (NGRBA) का गठन किया ताकि गंगा की बिगड़ती स्थिति (BOD/DO स्तर, औद्योगिक प्रदूषण, अवैध खनन, गंदे नालों का मिलना) को देखते हुए इसे विशेष दर्ज़ा मिल सके, वहीं नमामि गंगे मिशन 2014 के बाद से गंगा के कई हिस्सों में BOD स्तर को 3 mg/L से नीचे और DO स्तर को 5 mg/L से ऊपर बनाए रखने के लिए प्रयासरत है ।

मानसून की अनिश्चितता और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न क्लाउडबर्स्ट, फ्लैश फ्लड्स और हिमालयी आपदाओं ने यह और स्पष्ट कर दिया है कि जल संकट केवल संसाधनों की कमी नहीं बल्कि एक Climate-linked disaster है, इसलिए बच्चों और पंचायतों को आपदा प्रबंधन शिक्षा से भी जोड़ना ज़रूरी है ।

अब यदि हम विदेशों के अनुभवों पर नज़र डालें तो इज़राइल में “Every Drop Counts” अभियान के तहत बच्चों को पानी की खपत मापने और ड्रिप इरिगेशन की दक्षता सीखाई जाती है, सिंगापुर में NEWater Education Centre बच्चों को Wastewater treatment और Recycled water दिखाता है और Water Ambassadors उन्हें समाज तक संदेश पहुँचाने में सक्षम बनाते हैं ।

ऑस्ट्रेलिया में 1995 से Waterwise Schools Program चल रहा है जिसमें बच्चे फील्ड विज़िट और वेटलैंड अध्ययन करते हैं, अमेरिका में Project WET (Water Education for Teachers) के तहत बच्चों को जल-चक्र, भूजल और प्रदूषण पर प्रयोग कराए जाते हैं, यूरोप (Blue Schools Initiative) में बच्चे “Water Footprint” निकालते हैं यानी उनके भोजन, कपड़े और नहाने में कितने लीटर पानी अप्रत्यक्ष रूप से खर्च होता है, जापान में बच्चों को सुनामी और भूकंप के दौरान जल प्रबंधन और शुद्धिकरण सिखाया जाता है, वहीं अफ्रीकी देशों (केन्या, साउथ अफ्रीका) में UNICEF और NGOs के सहयोग से “School WASH Program” के जरिए बच्चों को वर्षा जल संचयन टैंक बनाने और साफ पानी उपयोग करने की शिक्षा दी जाती है ।

इन सभी अंतरराष्ट्रीय मॉडलों में एक समानता है—बच्चों को केवल श्रोता (listeners) नहीं बल्कि परिवर्तन के दूत (Change Agents) बनाया गया है; भारत यदि इन मॉडलों को अपने 2.38 लाख पंचायतों और 15 लाख विद्यालयों से जोड़े तो “जल आत्मनिर्भर भारत 2047” का सपना वास्तविकता बन सकता है, क्योंकि तब बच्चे बचपन से जल प्रहरी बनेंगे, पंचायतें सामुदायिक जल लोकतंत्र को जीवित रखेंगी, विज्ञान और मनोविज्ञान आँकड़े और आदतें देंगे, न्यायालय नीति का ढाँचा मज़बूत करेगा और अंतरराष्ट्रीय अनुभव हमें नवीन दिशा देंगे—यही वह समेकित मार्ग है जिससे भारत अपनी जल चुनौतियों को अवसर में बदल सकता है।