जलकुंभी संकट भारत की आर्द्रभूमियों पर सबसे बड़ा आक्रांता पौधा और उसका वैज्ञानिक-कानूनी समाधान
जलकुंभी संकट भारत की आर्द्रभूमियों पर सबसे बड़ा आक्रांता पौधा और उसका वैज्ञानिक-कानूनी समाधान

जलकुंभी संकट

भारत की आर्द्रभूमियों पर सबसे बड़ा आक्रांता पौधा और उसका वैज्ञानिक-कानूनी समाधान

अजय सहाय

भारत में जलकुंभी (Eichhornia crassipes) का संकट पिछले 120 वर्षों से धीरे-धीरे तालाबों, नदियों और झीलों को अपनी गिरफ्त में ले चुका है और आज यह देश के लगभग 20 लाख हेक्टेयर से अधिक जल क्षेत्र को प्रभावित कर चुका है, जो कि जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सुरक्षा तीनों के लिए गहरा संकट है। इस पौधे की अनियंत्रित वृद्धि का सीधा कारण प्रदूषण है और यह स्थिति राज्यवार अलग-अलग रूप में सामने आती है।

यदि हम राज्य और जिला स्तर पर आँकड़ों को देखें तो सबसे पहले उत्तर प्रदेश की स्थिति सामने आती है, जहाँ गंगा और उसकी सहायक नदियों (यमुना, घाघरा, गोमती) के किनारे बसे ज़िलों में जलकुंभी तेजी से फैली है। CPCB और उत्तर प्रदेश जल निगम की रिपोर्टों के अनुसार कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, गाज़ीपुर, बहराइच और बलिया ज़िलों के तालाबों और गंगा तटीय क्षेत्रों में जलकुंभी ने लगभग 2.2 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को प्रभावित किया है।

कानपुर में जाजमऊ के पास गंगा का DO स्तर 2.5 mg/L तक गिर चुका है और BOD 6–8 mg/L तक पहुँचने से यहाँ जलकुंभी पूरे जल क्षेत्र को ढँक देती है, जिसके कारण मत्स्य पालन 35% तक घटा है। इसी तरह प्रयागराज और वाराणसी के गंगा तटीय क्षेत्र में जलकुंभी का फैलाव गंगा आरती स्थल तक पहुँच चुका है, जिससे पर्यटन और नौकायन प्रभावित हुआ है। बिहार की स्थिति भी अत्यंत गंभीर है।

ISRO-NRSC के 2023 के उपग्रह मानचित्रण में पाया गया कि बिहार की लगभग 12,000 हेक्टेयर आर्द्रभूमि जलकुंभी से ग्रसित है। इनमें सबसे प्रमुख है कांवड़ झील (बेगूसराय, 6,700 हेक्टेयर) जहाँ जलकुंभी ने 60% सतही क्षेत्र को ढँक लिया है और इसके कारण मछली उत्पादन 30% घट गया है। इसी तरह बरैला झील (वैशाली, 2,000 हेक्टेयर), गोकुल वेटलैंड (पूर्वी चंपारण, 1,000 हेक्टेयर) और घोड़ा कटोरा झील (राजगीर, नालंदा, 200 हेक्टेयर) भी बुरी तरह प्रभावित हैं।

वैशाली और मुज़फ्फरपुर ज़िलों के ग्रामीण रिपोर्ट करते हैं कि जब तालाब जलकुंभी से भर जाते हैं तो पशुओं को पानी पिलाना तक असंभव हो जाता है। दरअसल बिहार के चंपारण, मधुबनी, समस्तीपुर और पटना जिलों में नालों और सीवेज के तालाबों से जुड़ने के कारण जलकुंभी की वृद्धि सबसे अधिक है।

पश्चिम बंगाल की ईस्ट कोलकाता वेटलैंड्स (12,500 हेक्टेयर क्षेत्र) पर जलकुंभी का कब्ज़ा लंबे समय से बना हुआ है। यहाँ के प्रमुख ज़िले कोलकाता, हावड़ा और नदिया हैं। इन क्षेत्रों में जब जलकुंभी फैलती है तो न केवल मत्स्य उत्पादन पर असर पड़ता है बल्कि कोलकाता महानगर को मिलने वाले पुनर्नवीनीकृत जल की गुणवत्ता भी बिगड़ जाती है। पश्चिम बंगाल सरकार की 2022 की रिपोर्ट बताती है कि जलकुंभी की सफाई पर प्रतिवर्ष 40 करोड़ रुपये से अधिक खर्च करना पड़ता है।

असम और पूर्वोत्तर भारत की झीलें भी बुरी तरह प्रभावित हैं। सबसे प्रमुख है दीमा हसाओ ज़िले की लोकटक झील (मणिपुर) और असम की दीपोर बील झील (गुवाहाटी, 4,000 हेक्टेयर) जहाँ जलकुंभी की मोटी परत ने प्राकृतिक जल प्रवाह और मछलियों के प्रजनन क्षेत्र को ढँक लिया है। असम के कामरूप और नगांव ज़िले भी जलकुंभी संकट से ग्रस्त हैं। यहाँ के मत्स्य विभाग ने रिपोर्ट दी कि 2023 में केवल दीपोर बील में जलकुंभी फैलने से 250 टन से अधिक मछली उत्पादन का नुकसान हुआ। ओडिशा की चिलिका झील (एशिया की सबसे बड़ी खारे पानी की झील, 1,10,000 हेक्टेयर) का लगभग 8,000 हेक्टेयर क्षेत्र जलकुंभी से ग्रसित है।

खासकर खुर्दा और गंजाम ज़िले में जलकुंभी फैलने से इरावदी डॉल्फिन और स्थानीय मछली प्रजातियों पर खतरा बढ़ गया है। ओडिशा हाईकोर्ट ने भी 2021 में राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि जलकुंभी को हटाने के लिए स्थायी रणनीति अपनाई जाए। मध्य प्रदेश की भोपाल झील (बड़ी झील, 3,000 हेक्टेयर) और इंदौर जिले की बिलावली झील लंबे समय से जलकुंभी संकट का सामना कर रही हैं। भोपाल की झील में जलकुंभी के कारण DO स्तर 6 mg/L से घटकर 2.5 mg/L दर्ज हुआ है, जिसके कारण मत्स्य पालन प्रभावित हुआ और पीने योग्य जल की शुद्धता कम हो गई।

कर्नाटक और केरल की झीलें भी इससे अछूती नहीं हैं। बेंगलुरु की बेलंदूर झील (360 हेक्टेयर) में जलकुंभी की इतनी मोटी परत बन गई है कि झील की सतह पर आग लगने की घटनाएँ तक दर्ज की गईं। यहाँ के जिलों—बेंगलुरु अर्बन और कोलार—में नालों से मिलने वाला सीवेज इस समस्या को और बढ़ाता है। केरल के वेम्बनाड झील (16,000 हेक्टेयर, अलाप्पुझा और कोट्टायम जिलों में फैली) के 4,000 हेक्टेयर क्षेत्र पर जलकुंभी का कब्ज़ा है, जिससे केरल की बैकवॉटर मत्स्य पालन और पर्यटन उद्योग पर गहरा असर पड़ा है।

दिल्ली की यमुना नदी विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यहाँ के शाहदरा, मयूर विहार और वज़ीराबाद क्षेत्र में जलकुंभी के फैलाव के कारण नदी का 40–50% हिस्सा साल के अधिकांश समय हरा कालीन जैसा दिखाई देता है। दिल्ली जल बोर्ड की रिपोर्ट बताती है कि यहाँ BOD स्तर 40 mg/L तक पहुँच चुका है, जिसके कारण जलकुंभी का फैलाव प्राकृतिक रूप से नियंत्रित ही नहीं हो सकता। अन्य राज्यों में भी जलकुंभी संकट गहरा रहा है।

राजस्थान की अजमेर झील, गुजरात की कांकरेज झील, तमिलनाडु की कोयंबटूर झीलें और आंध्र प्रदेश की कृष्णा डेल्टा की नहरें जलकुंभी से भर चुकी हैं। आर्थिक दृष्टि से FAO और UNEP की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार केवल भारत ही प्रतिवर्ष ₹1,500–1,800 करोड़ का नुकसान जलकुंभी के कारण उठाता है। इसमें मछली उत्पादन की हानि (लगभग 4–5 लाख टन वार्षिक), जल परिवहन बाधा (गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन में नौकायन कठिन), सिंचाई नहरों का अवरोध (पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की नहरें) और स्वास्थ्य लागत शामिल है।

स्वास्थ्य मंत्रालय की 2022 की रिपोर्ट बताती है कि बिहार, पश्चिम बंगाल और असम के वे ज़िले जहाँ जलकुंभी 40% से अधिक तालाब क्षेत्र को ढँकती है, वहाँ मलेरिया और डेंगू की दर सामान्य जिलों की तुलना में 2.7 गुना अधिक है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जब किसी जलाशय का BOD 4 mg/L से ऊपर और DO 2 mg/L से नीचे चला जाता है तो वहाँ जलकुंभी की वृद्धि विस्फोटक हो जाती है। यही कारण है कि गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और गोमती जैसी प्रदूषित नदियों में जलकुंभी की वृद्धि सबसे अधिक है। ISRO-NRSC के रिमोट सेंसिंग डेटा (Sentinel-2 और Landsat-9) बताते हैं कि केवल 2020 से 2023 के बीच गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन में जलकुंभी क्षेत्रफल में 12% वृद्धि दर्ज की गई है।

इसके साथ ही वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार एक हेक्टेयर जलकुंभी प्रतिदिन 8,000–10,000 लीटर पानी का वाष्पोत्सर्जन (evapotranspiration) कर देती है, जिससे जलस्रोतों का स्तर घटता है और भूजल पुनर्भरण की क्षमता भी कम हो जाती है। कानूनी और नीति स्तर पर बंगाल वॉटर हायसिंथ एक्ट, 1936 और हाल में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के 2024 आदेश जलकुंभी नियंत्रण के सबसे बड़े आधार हैं।

इसके साथ ही बिहार, उत्तर प्रदेश, ओडिशा और कर्नाटक ने अपने-अपने राज्य जल नीति में जलकुंभी को नियंत्रित करने के लिए बायो-कंट्रोल, मैकेनिकल रिमूवल और सामुदायिक सहभागिता को प्राथमिकता दी है। रोज़गार और आजीविका के अवसरों की बात करें तो केरल, कर्नाटक और असम के महिला स्वयं सहायता समूह (SHGs) जलकुंभी से हैंडबैग, चटाई, टोकरी और फर्नीचर बना रहे हैं।

वैज्ञानिक प्रयोगशालाएँ इसके रेशों से बायोगैस, बायोफ्यूल, कागज और कार्बन ब्लैक तैयार कर रही हैं। बिहार सरकार की जल-जीवन-हरियाली योजना में भी जलकुंभी को कम्पोस्ट और बायोगैस उत्पादन में जोड़ने की पहल हुई है। इस प्रकार यदि हम राज्य और ज़िला स्तर की स्थिति का वैज्ञानिक, पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण करें तो यह साफ है कि जलकुंभी केवल एक खरपतवार नहीं बल्कि भारत की जल सुरक्षा और आर्द्रभूमि पारिस्थितिकी के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

आने वाले वर्षों में यदि सामुदायिक सहभागिता, न्यायालयीन निगरानी, वैज्ञानिक बायो-कंट्रोल और वैकल्पिक रोजगार सृजन को एकीकृत नहीं किया गया तो भारत की 30–40% आर्द्रभूमियाँ जलकुंभी के शिकंजे में आकर अपना अस्तित्व खो देंगी। इसलिए 2047 तक जलकुंभी मुक्त भारत की राष्ट्रीय नीति बनाना उतना ही आवश्यक है जितना कि जल आत्मनिर्भर भारत का लक्ष्य ।