आर्द्रभूमि संरक्षण न्यायालयीय निर्णयों से जल आत्मनिर्भर भारत 2047 की दिशा
आर्द्रभूमि संरक्षण न्यायालयीय निर्णयों से जल आत्मनिर्भर भारत 2047 की दिशा

आर्द्रभूमि संरक्षण

न्यायालयीय निर्णयों से जल आत्मनिर्भर भारत 2047 की दिशा

अजय सहाय

भारत की आर्द्रभूमियाँ (Wetlands), जिन्हें प्रकृति की किडनी कहा जाता है, देश की पर्यावरणीय सुरक्षा, भूजल पुनर्भरण, बाढ़ नियंत्रण, जलवायु परिवर्तन शमन और जैवविविधता के लिए जीवनरेखा हैं, किंतु पिछले पाँच दशकों में इनका तेज़ी से क्षरण हुआ है—राष्ट्रीय वेटलैंड एटलस (ISRO–2011) के अनुसार भारत में कुल 15.26 लाख हेक्टेयर से अधिक आर्द्रभूमि दर्ज हैं, जिनमें से लगभग 30% क्षेत्र शहरीकरण, औद्योगिक प्रदूषण और अतिक्रमण के कारण नष्ट होने की कगार पर है, इस संकट ने न्यायपालिका को मजबूर किया कि वह समय-समय पर हस्तक्षेप करे और wetlands के संरक्षण के लिए आदेश जारी करे ।

सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों के कई ऐतिहासिक फैसले इस दिशा में मार्गदर्शक साबित हुए हैं—जैसे 2001 का Hincha Lal Tiwari बनाम कमला देवी केस जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा कि तालाब और wetlands सामुदायिक संसाधन (community resources) हैं और राज्य सरकारों का संवैधानिक दायित्व है कि इन्हें सुरक्षित रखें, अदालत ने कहा कि wetlands पर निजी निर्माण करना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन के अधिकार) और सार्वजनिक ट्रस्ट सिद्धांत (Public Trust Doctrine) का उल्लंघन है ।

इसके बाद 2011 में Jagpal Singh बनाम पंजाब राज्य केस आया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को आदेश दिया कि सभी ग्राम सभा की ज़मीन, तालाब और wetlands को अवैध कब्ज़े से मुक्त कराया जाए, अदालत ने चेतावनी दी कि यदि इनका संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियाँ जल संकट और पारिस्थितिक आपदा झेलेंगी ।

2017 में M.K. Balakrishnan बनाम भारत संघ केस में सुप्रीम कोर्ट ने और कठोर रुख अपनाते हुए कहा कि भारत की सभी wetlands Public Trust Doctrine के अंतर्गत आती हैं, यानी राज्य इनकी मालिक नहीं बल्कि केवल संरक्षक हैं, और Wetlands Rules 2010 को पूरी तरह लागू करने का आदेश दिया, अदालत ने Wetlands Atlas तैयार करने, राज्यों में जिला-स्तरीय Wetland प्राधिकरण बनाने और GIS mapping अनिवार्य करने के निर्देश दिए, इसी के बाद 2017 में Wetland Rules संशोधित हुए ।

इन नियमों के तहत wetlands में किसी भी प्रकार का निर्माण, भूमि परिवर्तन, भूजल दोहन, ठोस अपशिष्ट फेंकना, औद्योगिक अपशिष्ट डालना और अवैध खनन पूरी तरह प्रतिबंधित किया गया; सुप्रीम कोर्ट के इन आदेशों ने wetlands संरक्षण को न्यायिक मान्यता ही नहीं दी बल्कि इसे संवैधानिक और नीतिगत ढाँचे से भी जोड़ दिया ।

इसके अलावा हाईकोर्टों ने भी कई महत्वपूर्ण फैसले दिए—दिल्ली हाईकोर्ट ने 2001 में ओखला बर्ड सैंक्चुरी मामले में wetlands को प्रदूषण और अवैध निर्माण से बचाने का आदेश दिया, गुजरात हाईकोर्ट ने 2012 में थोल झील मामले में wetlands में औद्योगिक प्रदूषण रोकने के निर्देश दिए, मद्रास हाईकोर्ट ने 2015 में wetlands पर किसी भी प्रकार का निर्माण रोकने का आदेश दिया और कहा कि wetlands नष्ट करना पारिस्थितिकी के खिलाफ अपराध है ।

वहीं केरल हाईकोर्ट ने 2018 में वेम्बनाड झील और कोल वेटलैंड्स पर अवैध रियल एस्टेट निर्माण को अवैध घोषित किया और wetlands को जनता की धरोहर बताया; इन न्यायिक हस्तक्षेपों का सीधा असर राज्यों की नीतियों पर पड़ा और कई जगह wetlands को बचाने के लिए विशेष योजनाएँ बनीं।

अब यदि हम राज्यवार केस स्टडी देखें तो बिहार का कांवड़ झील (Begusarai) जो एशिया की सबसे बड़ी freshwater oxbow lake है और 2020 में रामसर साइट घोषित हुई, इसका क्षेत्रफल कभी 68 वर्ग किलोमीटर था लेकिन अतिक्रमण, मछलीपालन और प्रदूषण के कारण अब यह घटकर 26 वर्ग किलोमीटर रह गया है, यहाँ पर सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) दोनों ने सरकार को आदेश दिया कि wetlands से अतिक्रमण हटाएँ, sewage treatment plant बनाएं और migratory birds के आवास को सुरक्षित करें ।

इसी तरह झारखंड का टोपचांची झील जो धनबाद में स्थित है, वहाँ अवैध खनन और उद्योगों के कारण पानी प्रदूषित हुआ, जिसके खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट ने 2017 में आदेश दिया; उत्तर प्रदेश का ओखला बर्ड सैंक्चुरी जो यमुना नदी से जुड़ा wetland है, वहाँ दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने अवैध निर्माण और रियल एस्टेट प्रोजेक्ट रोकने के आदेश दिए, और buffer zone तय किया ।

गुजरात की थोल झील में औद्योगिक प्रदूषण और अवैध खनन रोकने का आदेश गुजरात हाईकोर्ट ने 2012 में दिया ।

केरल की वेम्बनाड झील जो देश की सबसे बड़ी रामसर साइट है, वहाँ सुप्रीम कोर्ट और केरल हाईकोर्ट ने बार-बार हस्तक्षेप कर sand mining, illegal tourism और real estate activities पर रोक लगाई; इन केस स्टडी से स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका का हस्तक्षेप wetlands को बचाने में निर्णायक भूमिका निभाता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से wetlands के महत्व को समझना भी आवश्यक है—एक hectare wetland प्रतिवर्ष 10 लाख लीटर पानी शुद्ध करती है, 40 लाख लीटर वर्षाजल संग्रहित करती है, 6.5 टन कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करती है, और बाढ़ के समय लगभग 3.5 करोड़ लीटर पानी नियंत्रित कर सकती है ।

wetlands भूजल recharge में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, NITI Aayog की रिपोर्ट (2022) के अनुसार भारत में हर वर्ष लगभग 4000 BCM वर्षाजल गिरता है जिसमें से 3200 BCM बर्बाद हो जाता है, यदि wetlands को सुरक्षित कर लिया जाए तो इसमें से कम से कम 400–500 BCM पानी संग्रहित और recharge किया जा सकता है, जिससे जल संकट पर काबू पाया जा सकता है; इसी कारण Wetlands को जल आत्मनिर्भर भारत 2047 की रणनीति का केंद्र माना गया है ।

भारत ने अब तक 75 wetlands को रामसर साइट्स के रूप में चिन्हित किया है, जिनमें से 49 को 2014 के बाद जोड़ा गया, यह wetlands न केवल जल संग्रहण करते हैं बल्कि migratory birds और biodiversity को भी संरक्षित करते हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी wetlands संरक्षण के कई उदाहरण हैं—जैसे अमेरिका का Everglades Wetland Restoration Project, चीन का Yangtze Wetland Protection Model, और ऑस्ट्रेलिया का Murray-Darling Basin Wetland Plan, इन मॉडलों में सरकार, स्थानीय समुदाय और तकनीकी विशेषज्ञ मिलकर wetlands का संरक्षण करते हैं, भारत भी अब ISRO के satellites (Sentinel-1 SAR, Landsat-8/9, ICESat-2), UAV photogrammetry और DGPS bathymetry जैसी तकनीकों का उपयोग कर wetlands का सटीक मानचित्रण और monitoring कर रहा है, ताकि encroachment और जल स्तर के बदलाव को समय रहते पकड़ा जा सके।

न्यायपालिका के इन आदेशों का सामाजिक प्रभाव भी गहरा रहा है—बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में Catch the Rain, Jal-Jeevan-Hariyali और Amrit Sarovar अभियान के तहत wetlands की पहचान की गई, इनके चारों ओर trenches, soak pits और plantation किए गए, school children और युवा पीढ़ी को mascots और awareness programmes के जरिए wetlands के महत्व से जोड़ा गया ।

उदाहरण के लिए मुजफ्फरपुर का Manikamaun Wetland जहाँ community participation और school awareness के माध्यम से wetland संरक्षण की नई पहल हुई, वहाँ 30,000 feet trenches, 50 soak pits और 20,000 plantations ने rainwater storage और groundwater recharge की दिशा में नया model प्रस्तुत किया ।

इसी प्रकार Rampur, Buxar में 4243 acre क्षेत्र में community participation से ponds और check dams बनाए गए जिससे 565 करोड़ लीटर वर्षाजल संग्रहित हुआ, हजारों blackbuck और deer लौटकर wetlands में आने लगे, यह दर्शाता है कि wetlands का संरक्षण न केवल पानी और पर्यावरण के लिए आवश्यक है बल्कि वन्यजीव और biodiversity के लिए भी अनिवार्य है।

इन सब तथ्यों को देखते हुए कहा जा सकता है कि wetlands संरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्टों के आदेश केवल कानूनी निर्देश नहीं बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए चेतावनी हैं, यदि wetlands को नहीं बचाया गया तो भारत आने वाले दशकों में गंभीर जल संकट, जैवविविधता ह्रास और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से जूझेगा ।

इसलिए आवश्यक है कि अदालतों के आदेशों को जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए जनभागीदारी, पंचायतों की सक्रियता, स्कूल और युवाओं की भागीदारी, तथा आधुनिक तकनीक का समन्वय किया जाए, तभी हम 2047 तक एक जल आत्मनिर्भर और पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित भारत बना पाएंगे।