हाल के वर्षों में ठंड के मौसम में उत्तरी हवाओं के असामान्य रूप से गहरे प्रवेश
पंकज चतुर्वेदी
कर्नाटक के हुबली -धारवाड़ में कभी स्वेटर की दुकान नहीं होती थी, आज वहाँ लोग रूम हीटर खरीद रहे हैं । यह हाल भीषण गर्मी के लिए मशहूर पूरे उत्तरी-कर्नाटक का है। धारवाड़ में तापमान लगातार 10.2 डिग्री के आसपास है । इसी तरह, गदग में न्यूनतम तापमान 10.8, बीदर में 10 डिग्री सेल्सियस, हासन में 8 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया ।
हासन, विजयपुर में बाजारों में पहली बार जाड़े के कपड़ों की बिक्री जमकर हो रही है । बैंगलुरु में इतनी सर्दी कभी देखी नहीं गई । उधर चेन्नई में सालों बाद 20 डिग्री से नीचे तापमान गया और समुद्र किनारे के इस महानगर के लिए यह कड़ाके की ठंड हो गया ।
ऊटी तो चलो राज्य का पहाड़ी क्षेत्र है लेकिन वहाँ भी तापमान 5.3 हो जाना अचरज है। ईरोड के तलवाड़ी में 11.4 डिग्री, डिग्री, धर्मपुरी के कुछ हिस्सों में 15 डिग्री , कोयंबतूर के पेरियनायकन पालयम में 15.8 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया।
यही हाल आंध्र प्रदेश के बहुत से हिस्सों में हैं । मौसम का बदलता यह मिजाज समाज, अर्थ व्यवस्था आदि अपर दूरगामी प्रभाव डालेगा और इस जलवायु परिवर्तन के लिए सरकार और समाज को चेत जाना चाहिए।
भारत के दक्षिणी प्रायद्वीपीय राज्यों – तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश-तेलंगाना और केरल – को आमतौर पर समशीतोष्ण या उष्णकटिबंधीय जलवायु के लिए जाना जाता है, जहाँ शीत लहर की स्थिति दुर्लभ होती है। हाल के वर्षों में ठंड के मौसम में उत्तरी हवाओं के असामान्य रूप से गहरे प्रवेश के कारण इन क्षेत्रों के आंतरिक हिस्सों में तापमान में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। मौसम विभाग की आंकड़ों के मुताबिक अप्रत्याशित शीत लहर के चलते बहुत सी जगह न्यूनतम तापमान सामान्य से तीन से पाँच डिग्री तक नीचे चला गया है । इसका सीधा बहुआयामी गंभीर असर स्थानीय पारिस्थितिकी प्रणालियों और मानव जीवन पर हो रहा है
भारत के एक प्रमुख थिंक टैंक संस्थान ‘सेंटर फॉर स्टडी ऑफ साइंस, टेक्नोलॉजी एण्ड पॉलिसी’ का एक शोध बताता है कि साल 2021-2050 के बीच दक्षिण भारत के बहुत से इलाकों का तापमान 0.5 डिग्री से 1.5 डिग्री तक और सर्दियों में न्यूनतम तापमान एक से दो डिग्री तक बढ़ सकता है। यही नहीं खरीफ और रवी दोनों खेती-मौसम में वर्षा में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
रिपोर्ट में राज्यों को जलवायु जोखिम मूल्यांकन और लचीली आधारभूत संरचना निर्माण की सलाह दी गई है। बढ़ती मौसम असमानता के कारण बाढ़ के बाद जल-जनित बीमारियाँ और तापमान में उतार-चढ़ाव से श्वसन संबंधी समस्याएं बढ़ी हैं। मौसम की ये प्रवृत्तियां दक्षिण भारत के समाज को नई चुनौती है ।
दक्षिण भारत की कृषि मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय फसलों पर निर्भर करती है, जो पाले या अत्यधिक ठंड के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती हैं। अप्रत्याशित शीत लहर से फसल को नुकसान और उपज में कमी की प्रबल संभावना होती है ।
सभी जानते हैं कि दक्षिण भारत, विशेषकर केरल, कर्नाटक के मलनाड अर्थात पहाड़ी क्षेत्र और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में कॉफी, चाय और इलायची जैसी बेशकीमती बागवानी फसलें उगाई जाती हैं, जो ठंड के लिए सबसे अधिक संवेदनशील हैं। कर्नाटक के चिकमगलूर और कोडागु तथा केरल व तमिलनाडु के पहाड़ी क्षेत्रों में, तापमान में अचानक गिरावट से पौधों की पत्तियाँ और नए अंकुर पाले से क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार तापमान कम होने पर कॉफी के पौधों में “लीफ स्कॉर्च” या पत्ती के झुलसने की समस्या शुरू हो जाती है, जिससे अगली उपज पर 15% से 25% तक असर पड़ सकता है।
ठंड की मार आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में केले की फसल पर पड़ने की संभावना है । पाला पड़ने पर पत्तियाँ भूरी और पीली पड़ जाती हैं, जिससे प्रकाश संश्लेषण रुक जाता है और फल छोटे रह जाते हैं। लंबे समय तक ठंड रहने से नारियल और सुपारी के पौधों में विकास रुक जाता है और ये रोगग्रस्त हो जाते हैं । ऐसा ही असर सब्जी और दालों की खेती अपर होगा।
सबसे बड़ी समस्या है कि यदि लगातार ठंड पड़ी तो दक्षिणी राज्यों की मिट्टी और सिंचाई पर घर नुकसान हो सकता है । अत्यधिक ठंडी मिट्टी पौधों की जड़ों द्वारा जल और पोषक तत्वों के अवशोषण को धीमा कर देती है, भले ही मिट्टी में पर्याप्त नमी हो।
कर्नाटक और तमिलनाडु में डेयरी उद्योग एक महत्वपूर्ण व्यवसाय है। वहाँ के मवेशी पीढ़ियों से गरम मौसम के अनुसार अपने शरीर को ढाल चुके हैं । अचानक शीत लहर के दौरान गायों और भैंसों को बीमारियाँ तो लगती ही हैं , शरीर का तापमान बनाए रखने के लिए उन्हें अधिक आंतरिक ऊर्जा खर्च करनी पड़ती है, जिसके परिणामस्वरूप उनके दूध उत्पादन में 10% से 20% तक की कमी दर्ज की जाती है। मवेशियों में निमोनिया और अन्य श्वसन संबंधी संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है।
आंध्र प्रदेश, विशेष रूप से कृष्णा और गोदावरी जिलों में, झींगा और मछली पालन के लिए प्रसिद्ध है। ये जलीय प्रजातियाँ तापमान परिवर्तन के प्रति अत्यंत संवेदनशील होती हैं। तालाबों में जब पानी का तापमान अचानक गिरता है, तो मछली की चयापचय दर कम हो जाती है, वे भोजन खाना बंद कर देती हैं, और रोगग्रस्त हो जाती हैं।
इस तरह अत्यधिक ठंड में मछली की सामूहिक मृत्यु भी हो सकती है। इसी तरह झींगा फार्मों में, पानी का तापमान 20 डिग्री से नीचे जाने पर झींगा का विकास रुक जाता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान होता है।
अचानक जाड़ा पड़ने के साथ ही दक्षिण भारत के लोगों की अस्पताल में भीड़ बढ़ गई है और अधिकांश लोग सर्दी- जुखाम और बुखार के शिकार हैं। बड़ी संख्या में सांस और खांसी एक मरीज अस्पताल पहुँच रहे हैं । चूंकि उनकी जीवनशैली और आवास हल्के मौसम के अनुरूप बने हैं, अचानक और तीव्र ठंड के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं।
वैसे भी उत्तरी भारत की तुलना में, दक्षिण भारत में लोग सर्दियों के लिए गर्म कपड़ों और हीटिंग सुविधाओं के लिए कम तैयार होते हैं, इस बार बढ़ती ठंड ने उन्हें अधिक जोखिम में ला दिया हैं। शीत लहर के दौरान सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्रों पर अचानक मरीजों का भार 20% से 40% तक बढ़ गया है, जिससे सीमित संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।
यदि मौसम वैज्ञानिकों की माने तो दक्षिण भारत में इस साल पड़ रही अधिक ठंड मुख्य रूप से अल्पकालिक मौसमी विसंगतियों जैसे – ठंडी हवाओं का गहरा प्रवेश, साफ आसमान, चक्रवात का अप्रत्यक्ष असर का परिणाम है।
लेकिन, जलवायु परिवर्तन इस बात की संभावना को बढ़ाता है कि शीत लहर जैसी चरम-मौसम की घटनाएं असामान्य रूप से तीव्र या अप्रत्याशित हो सकती हैं, जो दक्षिण भारत जैसे क्षेत्रों के लिए सामान्य नहीं हैं। याद रखना होगा कि दक्षिणी राज्यों में जहां एक तरफ भारत में लू की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ रही है, वहीं दूसरी तरफ असामान्य रूप से तीव्र शीत लहर जैसी घटनाएँ भी उभर रही हैं।
दक्षिण भारत के राज्यों में इस बार की अप्रत्याशित शीत लहर एक स्पष्ट संकेत है कि जलवायु परिवर्तन न केवल औसत तापमान को बढ़ा रहा है, बल्कि मौसमी घटनाओं को चरम और अप्रत्याशित बना रहा है। इस शीत लहर ने उजागर किया है कि आंतरिक कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे क्षेत्र अब अत्यधिक ठंड के प्रति असुरक्षित हैं।
जलवायु परिवर्तन का अर्थ केवल ‘ग्लोबल वार्मिंग’ नहीं है, बल्कि ‘मौसम की चरम सीमा’ है। दक्षिणी राज्यों की सरकारों को अब यह स्वीकार करना होगा कि ‘ठंड’ उनके लिए एक वास्तविक खतरा है और इसके लिए “डिजास्टर रेजिलिएंट साउथ इंडिया” (आपदा-सक्षम दक्षिण भारत) के विजन पर काम करना अनिवार्य है।
दक्षिण भारतीय राज्यों में, जहाँ बुनियादी ढांचा और जीवनशैली मुख्य रूप से गर्मी और आर्द्रता के अनुरूप बनी है, वहाँ अप्रत्याशित ठंड से निपटने के लिए सरकार को एक बहु-आयामी और दूरदर्शी रणनीति अपनाने की आवश्यकता है जिसमें लोगों को जीवन साहिली में बदलाव के लिए तैयार करने, मौसम पूर्वानुमान के मुताबिक खेती और पशुपालन के प्रशिक्षण आदि शामिल है ।