पानी की कमी के कारण फसलों की सिंचाई नहीं
विकास परसराम मेश्राम
रतलाम जिले के बजाना तहसील में स्थित घोड़ाखेडा, बगली, रामपुरिया और धावड़ादेह गांवों में रहने वाले लोगों के लिए जल संकट एक गंभीर चुनौती बन गया है। यह संकट केवल पीने के पानी की समस्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी विकराल समस्या है जो इन ग्रामीणों के जीवन के हर पहलू को प्रभावित करती है।
पानी की कमी के कारण फसलों की सिंचाई नहीं हो पाती, जिसके परिणामस्वरूप किसान साल में केवल एक ही फसल उगा पाते हैं। इस स्थिति ने एक दुष्चक्र को जन्म दिया है जिसमें पलायन, मजदूरी, भुखमरी और शोषण जैसी समस्याएं शामिल हैं।
इन गांवों में पानी की स्थिति इतनी विकट थी कि जानवरों के पीने के लिए भी पर्याप्त पानी नहीं था। गांव की महिला किसान कांताबाई वालिया अपने अनुभव साझा करते हुए बताती हैं कि पहले उनकी गाय को दिन में सिर्फ एक बार ही पानी पिलाया जा सकता था। सुबह पानी लेने के लिए निकलते थे तो दोपहर तक घर लौटते थे। यह स्थिति न केवल मनुष्यों बल्कि पशुओं के लिए भी अत्यंत कठिन थी।
इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए स्थानीय समुदाय ने अपनी प्राचीन परंपराओं की ओर रुख किया। वागधारा संस्था से जुड़े सामुदायिक कार्यकर्ता मोहन भूरिया हलमा परंपरा के बारे में विस्तार से बताते हैं। हलमा भील समाज की एक अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण परंपरा है, जो सामुदायिक एकता और सामाजिक दायित्व का प्रतीक है।
इस परंपरा के अनुसार, जब गांव में कोई व्यक्ति किसी संकट में फंस जाता है और अपनी पूरी शक्ति और प्रयास लगाने के बाद भी उस संकट से नहीं निकल पाता, तो वह हलमा का आह्वान करता है। हलमा के आह्वान पर पूरा गांव एकजुट होकर उस व्यक्ति की सहायता करता है और सामाजिक दायित्व निभाते हुए उसे संकट से बाहर निकालता है।
वागधारा द्वारा गठित ग्राम स्वराज समूह के सदस्य शांतिलाल पटेल ने इस पहल की शुरुआत की। उन्होंने सूखे और जल संकट से निपटने के लिए गांव में बोरी बंधान बनाने के लिए हलमा का आह्वान किया। इस आह्वान पर गांव के सभी लोग एकजुट हुए और सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से बोरी बंधान का निर्माण किया। यह पहल केवल एक तकनीकी समाधान नहीं थी, बल्कि यह परंपरा और आधुनिक जल संरक्षण तकनीक का एक सुंदर समन्वय था।
जनजातीय समुदाय का स्थानीय जैव-विविधता के साथ गहरा संबंध है। ये समुदाय अपनी जीविका के लिए प्रकृति पर निर्भर हैं और इसीलिए उन्होंने अपनी पुरातन परंपराओं और प्राकृतिक ज्ञान को सदियों से संजोकर रखा है। यह पारंपरिक ज्ञान न केवल उनकी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण का एक प्रभावी माध्यम भी है। इसी ज्ञान और परंपरा के कारण जंगल भी संरक्षित हैं और जनजातीय समुदाय भी अपना अस्तित्व बनाए रखने में सक्षम हैं।
बाजना ब्लाक के ग्राम रामपुरिया में हलमा परंपरा के तहत एक विशाल सामुदायिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में डोल-थाली की मधुर गूंज और सामूहिक श्रमदान के उत्साह के बीच ग्रामीणों ने बोरी बंधान का निर्माण किया। इस आयोजन ने एक महत्वपूर्ण संदेश दिया कि जब समाज एकजुट होता है, तो परंपरा भी पर्यावरण संरक्षण की एक शक्तिशाली ताकत बन जाती है। यह केवल एक निर्माण कार्य नहीं था, बल्कि यह सामुदायिक एकता और पर्यावरण के प्रति जागरूकता का प्रदर्शन था।
यह श्रमदान धावड़ादेह, बगली, घोड़ाखेड़ा और रामपुरिया गांवों के बीच स्थित एक बरसाती नाले पर किया गया। इस बोरी बंधान का उद्देश्य बरसात के पानी को रोकना और भूजल स्तर को बढ़ाना है। यह संरचना आने वाले समय में इन गांवों की जल समस्या को काफी हद तक कम करने में सहायक होगी। बरसात के पानी को रोककर उसे धरती में समाहित करने से भूजल स्तर बढ़ेगा और कुओं तथा हैंडपंपों में पानी की उपलब्धता बढ़ेगी।
हलमा आदिवासी समाज की एक अनोखी और प्रेरणादायक सामूहिक परंपरा है। इस परंपरा में तीन या अधिक गांवों और आसपास के क्षेत्रों के लोग स्वेच्छा से एकत्रित होते हैं और बिना किसी पारिश्रमिक या भुगतान की अपेक्षा के सामूहिक श्रमदान करते हैं। यह परंपरा समाज में सहयोग, एकता और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना को बढ़ावा देती है। इस आयोजन में धावड़ादेह, घोड़ाखेड़ा, बगली और रामपुरिया के ग्रामीणों ने बड़े उत्साह और समर्पण के साथ भागीदारी निभाई।
कार्यक्रम के दौरान जल संरक्षण के महत्व पर विशेष जोर दिया गया। वक्ताओं ने समझाया कि सामूहिक प्रयासों के माध्यम से जल संकट को काफी हद तक कम किया जा सकता है। जल केवल एक संसाधन नहीं है, बल्कि यह जीवन का आधार है। इसके संरक्षण की जिम्मेदारी पूरे समाज की है और जब समाज एकजुट होकर इस दिशा में काम करता है, तो परिणाम अत्यंत प्रभावी होते हैं।
वागधारा की ब्लाक सहजकर्ता रेणुका पोरवाल ने अपने संबोधन में कहा कि जल संरक्षण के लिए समुदाय की एकता अत्यंत आवश्यक है। जब लोग मिलकर एकजुट होकर कोई कार्य करते हैं, तो वह न केवल आसान हो जाता है, बल्कि उसके परिणाम भी अधिक प्रभावी और दीर्घकालिक होते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का समन्वय ही सतत विकास का मार्ग है।
इस पूरे कार्यक्रम का संचालन सामुदायिक सहजकर्ता मोहन भूरिया द्वारा किया गया। उन्होंने सुनिश्चित किया कि सभी गतिविधियां सुचारू रूप से संपन्न हों और सभी प्रतिभागी सक्रिय रूप से भाग लें। कार्यक्रम के दौरान ग्रामीणों ने परंपरागत तरीके से डोल, कुंडी और थाली बजाते हुए नृत्य किया। यह नृत्य और संगीत केवल मनोरंजन नहीं था, बल्कि यह उनकी सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक उत्सव का प्रतीक था। हर्षोल्लास के साथ सभी ने कार्यक्रम में भाग लिया और इस पवित्र कार्य को संपन्न करने में अपना योगदान दिया।
कार्यक्रम के समापन पर सभी ग्रामवासियों ने जल संरक्षण की शपथ ली। इस शपथ में उन्होंने संकल्प लिया कि वे हलमा की इस परंपरागत जल संरक्षण पद्धति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाएंगे। यह शपथ केवल एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि यह भविष्य के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और जिम्मेदारी का प्रदर्शन थी। उन्होंने यह समझ लिया है कि जल संरक्षण एक सतत प्रक्रिया है और इसके लिए पीढ़ी दर पीढ़ी प्रयास करने की आवश्यकता है।
इस महत्वपूर्ण आयोजन में रामपुरिया, बगली और घोड़ाखेड़ा के वागधारा द्वारा गठित ग्राम स्वराज समूहों ने सक्रिय भूमिका निभाई। बाजना ब्लाक के सामुदायिक सहजकर्ताओं ने भी पूरे कार्यक्रम में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ग्राम स्वराज समूह से फूलजी भूरिया, शांतिलाल पटेल, जालु, नाहर सिंह, हुकला, काली भूरिया, वालाराम चरपोटा, आभा चरपोटा, प्रवीण चरपोटा, वालचंद डामोर, मगन डोडियार, कपिल वसुनिया, रमेश चरपोटा, कैलाश चरपोटा, रविन्द्र हारी, रमेश चारेल जैसे अनेक सक्रिय सदस्यों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।
महिलाओं की भागीदारी भी इस कार्यक्रम की विशेषता रही। कांताबाई वालिया, मुनिया, परसराम, लुंजी बाई, हुमली, झाली, सुनीता जैसी महिला सदस्यों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इससे यह संदेश गया कि जल संरक्षण की जिम्मेदारी केवल पुरुषों की नहीं है, बल्कि महिलाएं भी इसमें समान रूप से भागीदार हैं। लालू, सुरपाल जैसे युवा सदस्यों की भागीदारी ने यह आश्वासन दिया कि यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों में भी जीवित रहेगी।
सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि इस कार्यक्रम में महिला सक्षम समूह की 89 महिला सदस्यों और ग्राम स्वराज समूह के 94 पुरुषों ने भागीदारी की। कुल मिलाकर 183 लोगों ने इस श्रमदान में हिस्सा लिया। यह संख्या इस बात का प्रमाण है कि जब समुदाय एक साथ आता है, तो कितनी बड़ी शक्ति उत्पन्न होती है।
इस पहल के परिणाम अब दिखाई देने लगे हैं। कांताबाई वालिया खुशी से बताती हैं कि अब उनके जानवरों को पीने के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध हो गया है। बोरी बंधान के निर्माण से पानी की स्थिति में सुधार आया है। यह एक छोटा लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव है जो समुदाय के जीवन की गुणवत्ता में सुधार ला रहा है। यह कार्यक्रम अन्य गांवों और समुदायों के लिए भी एक प्रेरणा है। यह दर्शाता है कि स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर ही संभव है। सरकारी योजनाओं के साथ-साथ समुदाय की सक्रिय भागीदारी अत्यंत आवश्यक है। जब समुदाय अपनी समस्याओं का स्वामित्व लेता है और उनके समाधान के लिए एकजुट होता है, तो परिणाम स्थायी और प्रभावी होते हैं।
वागधारा संस्था की भूमिका भी इस संपूर्ण प्रक्रिया में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। संस्था ने केवल तकनीकी सहायता ही नहीं दी, बल्कि समुदाय को संगठित करने, उनके पारंपरिक ज्ञान को पहचानने और आधुनिक समाधानों के साथ जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह दृष्टिकोण सतत विकास का आदर्श उदाहरण है।
अंततः यह कहा जा सकता है कि रतलाम के इन गांवों में हुई यह पहल केवल एक स्थानीय घटना नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक संदेश देती है। यह संदेश है कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक तकनीक का समन्वय, सामुदायिक एकता और सामूहिक प्रयास से किसी भी चुनौती का सामना किया जा सकता है। हलमा परंपरा ने यह साबित कर दिया है कि हमारी प्राचीन परंपराएं न केवल सांस्कृतिक विरासत हैं, बल्कि वे आज की समस्याओं के व्यावहारिक समाधान भी प्रदान कर सकती हैं।
स्वतंत्र पत्रकार एवं विकास क्षेत्र में कार्यरत, ग्रामीण विकास, जल संरक्षण, पर्यावरण