झारखण्ड - जिस राज्य की पहचान ही सुरम्य वन और सघन जल संसाधन हुआ करती थी,

झारखण्ड

जिस राज्य की पहचान ही  सुरम्य वन और सघन जल संसाधन हुआ करती थी, आज गर्मी की शुरुआत में ही बूंद बूंद पानी को तरसने लगता है. भले ही कितनी भी बारिश हो राज्य के 24 जिलों में बहनेवाली 196 में से 133 नदियों से पानी गायब हो जाता है , राज्य की पहचान खूबसूरत झरने लुप्त हो जाते हैं . घने वनों के लिए विख्यात खूंटी, पलामू, लातेहार, गुमला, चतरा, देवघर, दुमका, बोकारो और गिरिडीह की सभी नदियां सूख जाती हैं. सदाबहार नदियां अब नालियों की शक्ल में सामने आने लगी हैं. जलसंकट भी गहराता जा रहा है. राज्य में 10 से भी अधिक नदी बेसिन हैं. गुमानी, मयुराक्षी, अजय, शंख, दक्षिण कोयल, उत्तर कोयल, दामोदर, सुवर्णरेखा, खरकई और अन्य. बेसिन से मतलब है थाल. भोजन के थाल की तरह नदियों के थाल भी सम्बद्ध नदियों के जलग्रहण क्षेत्र के आधार पर निर्धारित किये जाते हैं. दुखद है कि राज्य की नदियों को महज बालू-रेत निकालने का जरिया मन लिया गया और तभी समूचे राज्य में नदियाँ  लुप्त हो रही हैं ,प्यास बढ़ रही है और पानी जुटाना दूभर हो रहा है .

जल धाराओं के प्रति समाज की बेपरवाही देखने के लिए  राज्य की राजधानी रांची की कभी जीवन रेखा कही जाने वाली हरमू नदी को देखना ही पर्याप्त है . यह सुबर्नरेखा नदी की बहुत छोटी सहायक नदी है और इसका उद्गम रांची शहर से ही लेटराइट मिट्टी है . इसका अस्तित्व बरसात पर निर्भर है . . जलवायु परिवर्तन की मार से झारखंड भी अछूता नहीं है और यहा अनियमित और कम बरसात दर्ज की जा रही है , इसका सीधा असर हरमू के अस्तित्व पर पड़ा . अब महज चार महीने इसमें  नदी जल होता है शेष दिनों नगर का गन्दा निस्तार ही इसमें तैरता है , जाहिर है कि कुछ दशकों में इसे एक नाला घोषित कर दिया जाएगा . अगर हरमू नदी के उद्गम स्थान को देखा , तो वहां पत्थरों का भी कटाव हो गया है. इसके चलते भी इस नदी पर खतरा मंडरा रहा है.

हरमू नदी की चौड़ाई 25 मीटर से घट कर कई स्थानों पर एक मीटर से कम हो गयी है। राची नगर-निगम की ओर से हरमू नदी के सौंदर्यीकरण के लिए करोड़ों रुपये खर्च किये जा चुके हैं। कई स्थानों पर चेकडैम भी बनाये जा रहे हैं, ताकि नदी के अस्तित्व को बचाया जा सके, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद हरमू नदी को पुनर्जीवित करने का प्रयास सफल नहीं होता दिख रहा है, बरसात में दो-तीन महीने को छोड़ कर अन्य दिनों में इसकी स्थिति एक बड़े नाले की तरह हो जाती है। गंदगी के कारण छठ महापर्व के दौरान श्रद्धालु यहा अ‌र्घ्य अर्पित करने से भी कतराते है।

स्वर्णरेखा, जुमार और पोटपोटो समेत कई बड़ी नदिया भी सिमट गयी है। वहीं इन बड़ी नदियों की कई सहायक नदिया तो पूरी तरह से सूख गयी है और अब विलुप्त होने के कगार पर है। जुमार नदी राची और आसपास के क्षेत्रों में कुछ वर्ष पहले तक करीब 30 मीटर चौड़ाई में बहती थी, लेकिन अब इसका भी अस्तित्व नहीं बचा है। इसकी चौड़ाई 10 मीटर तक ही है। यही हाल स्वर्णरेखा नदी का भी है। स्वर्णरेखा नदी की चौड़ाई सरकारी खतियान में 24.46मीटर है, लेकिन यह नदी हटिया और नामकुम में अब 5 मीटर से भी कम में सिमट कर रख गयी है। पोटपोटो नदी की चौड़ाई 32 से 37मीटर के बीच थी, लेकिन अब भी यह 7.5मीटर में सिकुड़ कर रह गयी है

आज हरमू नदी विनाश के कगार पर खड़ी है. हर जगह प्रदूषण फैला हुआ है. हरमू नदी का उद्गम लेटराइट मिट्टी से है. ये बारिश के जल पर निर्भर है. इधर, कुछ वर्षों से बारिश में भी कमी आयी है, जिसके चलते भी इस नदी केवल चार महीने ही प्राकृतिक जल रहता है. बाकी समय ये सिर्फ गंदे पानी से भरा रहता है. अगर हरमू नदी के उद्गम स्थान को देखा , तो वहां पत्थरों का भी कटाव हो गया है. इसके चलते भी इस नदी पर खतरा मंडरा रहा है. कुछ साल पहले तक सरकारी रिकार्ड में इस नदी की चौड़ाई 25 मीटर थी. जो अब  सिकुड़ कर कई स्थानों पर एक मीटर से कम बची है. सरकारी स्तर पर अभी तक कोई सौ करोड़ रूपये नदी को बचाने के लिए खर्च हुए लेकिन नदी का संकुचन रूक नहीं रहा है . आबादी बढ़ने के साथ ही नदी के आसपास के मोहल्लों से निकलने वाला गंदा पानी और गंदगी दोनों ही इस नदी में गिराये जाने लगे, जिसकी वजह से आज यह नदी पूरी तरह दूषित हो चुकी है. कभी साफ पानी के साथ कलकल कर बहने वाली इस नदी का पानी पूरी तरह काला हो चुका है. जो हरमू नदी के बारे में नहीं जानता है, उसे यह किसी बड़े और गंदे नाले की तरह दिखती है. बल्कि, आज राजधानी के ज्यादातर लोग इसे हरमू नाला कहकर ही पुकारते हैं.

हरमू नदी के अस्तित्व पर संकट का सबसे बड़ा कारण इसका शहर के बीचों बीच से बहना और  राजधानी बनाने के बाद रांची में जमीन के दाम आसमान को छूना है , इस नदी के मुख्य  प्रवाह में हर  आधा किलोमीटर पर 45 मकान बने हैं. कुछ जगह तो पूरा प्रवाह ही  अवैध निर्माण ने रोक लिया है . नदी के दोनों तरफ  झुग्गी बस्ती हैं और यहाँ रहने वाले लोग कबाड़े  या कूड़ा  जमा करने का काम करते हैं .  जब नदी पूरी तरह सूख जाती है तो हर साल इसमें एक से दो फूट तक प्लास्टिक व् अन्य कचरा जमा हो जाता है . अब इसमें बालू भी नहीं मिलती . तभी जब बरसात होती है तो रांची शहर में बाढ़ आ जाती है . हज़ारों साल से अविरल बह रही नदी मात्र तीन दशक में नाबदान बन गई . नदी में जब तब पानी होता है तो वह जहर ही होता है क्योंकि उसमें आर्सेनिक, क्रोमियम, शीशा, पारा, निकल इत्यादि जहरीले धातु निर्धारित मात्रा से कई सौ गुना अधिक भरे हुए हैं. नदी का पानी तो काम का है नहीं लेकिन इसके कारण दूर दूर तक भूजल भी जहरीला हो चुका है . इसमें पनपे बैक्टीरिया और रासायनिक  दूषण से चर्मरोग, पेट की बीमारी, लिवर की बीमारी, आंत की बीमारी, डायरिया, पीलिया आदि फ़ैल रहा है  

पिछले कुछ वर्षों में हरमू नदी को अतिक्रमण से मुक्त करने  और सुंदर बनाने के लिए कई अभियान चलाये गये. साथ ही नदी को दोबारा जिंदा करने का प्रयास शुरू हुआ. लेकिन हरमू नदी की तकदीर और तसवीर नहीं बदली है. उल्टे नदी के सौंदर्यीकरण के नाम पर इसके प्राकृतिक बहाव को खत्म कर दिया गया. किनारों पर पत्थर लगाये गये. साथ ही नदी के किनारे-किनारे नाली बनाने और पैदल चलने के लिए पाथ-वे बनाने का भी शुरू हुआ. पर काम की गुणवत्ता इतनी निम्न स्तर की रही कि  महीनों में ही निष्प्रभावी हो गई.

हरमू बाइपास के पास एक बोर्ड लगाया गया है, जिसपर चेतावनी लिखी गयी है कि हरमू नदी में कचरा फेंकना संगीन अपराध है. पकड़े जाने पर जुर्माना सहित कारावास होगा. पर शहरी क्षेत्र में तकरीबन सभी स्थानों पर नदी में कचरा दिखता है. भट्ठा मोहल्ला, विद्यानगर, चालानगर, नदी ग्राउंड हिंदपीढ़ी, हरमू कॉलोनी, कडरू का निचला हिस्सा, पुलटोली से होकर स्वर्णरेखा में मिलने के पूरे रास्ते में जहां कहीं भी नदी के आसपास बस्तियां आबाद हैं, वहां के लोग अपना कचरा नदी में ही फेंकते हैं. मुक्तिधाम के पास, पीपी कंपाउंड के पास के इलाके में कई अपार्टमेंट का गंदे पानी का बहाव नदी में ही मोड़ दिया गया है. हरमू मुक्तिधाम अौर विद्यानगर पुल आनंदपुरी के पास तीन-चार खटाल हैं, जिन्हें कई बार हटाया गया है, लेकिन ये दोबारा वहीं बस जाते हैं. इनकी सारी गंदगी नदी में ही गिरती है.

जुड़को कंपनी द्वारा हरमू मुक्तिधाम अौर हरमू फल मंडी के पास दो सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाये गये हैं. बावजूद नदी में गंदगी और गंदा पानी गिरने से नहीं रोका जा सका है. यहां तैनात गार्ड इसके बारे में कुछ भी नहीं बता पाया. मुक्तिधाम के पास नदी में कुछ दूर तक पाथ-वे बनाया गया है. हरमू बाइपास पुल के पास नदी के ढलान पर घास अौर सजावटी पौधे भी लगाये गये, लेकिन रख-रखाव के अभाव में ये सूखने लगे हैं. मुक्तिधाम से लेकर नदी के रास्ते में शौचालय बनाये गए परन्तु , सभी शौचालयों में ताला बंद रहता है. ऐसे में अब भी आसपास की बस्तियों के लोग नदी के किनारे ही शौच करते हैं.

शहरी क्षेत्रों में हरमू नदी अत्यंत ही प्रदूषित है, लेकिन इसके उलट आबादी से दूर ग्रामीण क्षेत्रों में नदी का पानी काफी साफ है. करमसोकड़ा, उससे आगे मुड़ला पहाड़, हेहल पीपरटोली, हेहल नदी पार जैसे इलाके में ग्रामीणों ने नदी में जगह-जगह मिट्टी से बांध बनाकर पानी रोका है. इसमें जमा पानी में ही लोग नहाते हैं, कपड़ा-बर्तन धोते हैं और मवेशियों को पानी पिलाते हैं. जब तक नदी में पानी रहता है तब तक आसपास के खेतों की सिंचाई भी इसी से होती है.

बिहार के समय (अभी के झारखंड क्षेत्र में) छोटी-बड़ी करीब 141 नदियां साल भर कल-कल निर्विघ्न विचरण करती थीं. विडम्बना है कि इनके में अधिकाँश का अस्तित्व ही मिट गया , सरकारी रिकार्ड महज 16 बड़ी और 24 से अधिक छोटी नदियों का रिकार्ड दिखाता हैं. ज्यादातर नदियां गर्मी शुरू होते ही सूख जाती हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है, नदियों के किनारे बेतरतीब ढंग से अवैध बसावट. नदी के बहाव क्षेत्र को भरकर अतिक्रमण कर लिया गया है.वर्ष 1928 और 1932 के नक्शे को अगर देखा जाये, तो रांची में छोटी-छोटी नदियों का जाल था. जो अब नहीं दिखता है.

सुवर्णरेखा नदी :  छोटानागपुर के पठार में अपने उद्गम से निकल कर  बंगाल की खाड़ी में गिरने तक सुवर्णरेखा नदी  झारखण्ड के अलावा पश्चिम बंगाल और ओड़िसा होते हुए कोई 393 किलोमीटर का सफ़र तय करती  है . झारखंड की राजधानी रांची से करीब 16 किलोमीटर दूर नगड़ी गांव के रानीचुआं परिसर स्थित एक छोटे से चुआं यानी खेत में छोटे गड्ढे से पानी की धार निरंतर निकल रही है। यहां से निकलने के बाद कुछ दूर आगे बढ़ने पर ये झारखंड की जीवनदायिनी स्वर्णरेखा नदी का रूप ले लेती है। सदियों से निरंतर कलकल बहने वाली झारखंड की यह एक ऐसी नदी है, जिसका अस्तित्व किसी अन्य दूसरी नदियों में जाकर खत्म नहीं हो जाता। इसके उद्गम स्थल पर प्राचीन रानीचुआं अब भी है, लेकिन अब वहां से पानी नहीं निकलता है। औद्योगिकीकरण और विकास की दौड़ में चुआं के चारों ओर नदी का नामोनिशान तक नहीं है। वहां चारों ओर खेती होती है। नदी की धारा को बहने देने के लिए इंच भर भी जमीन नहीं बची है।

जाहिर है कि जब जल ही नहीं है तो धारा के लिए जमीन कोई क्यों छोड़ेगा। यह अलग बात है कि पहले की तरह अब भी श्रद्धालु मकर संक्रांति के दिन स्वर्णरेखा के कथित उद्गम स्थल पर जुटते हैं। वहां हर साल मेला लगता है और लोग वहीं दही-चूड़ा खाकर नदी के प्रति अपनी श्रद्धा जताने की रस्म अदायगी करते हैं

नदी के उद्गम स्थल पर ही जमे पानी को देख कर यह पता चलता है कि जल स्त्रोत के साथ धरती के अंदर से खनिज  भी पानी के साथ बाहर आ रहे हैं। अपने साथ स्वर्ण अंश लेकर बहने के कारण ही नदी को स्वर्णरेखा नदी कहते हैं। इससे सैकड़ों परिवारों का गुजर-बसर हो रहा है। नदी की रेत से सोने के कण बीनने वाले परिवारों से बातचीत में यह जानकारी मिलती है कि नदी के रेत से निकलने वाले सोने के कण गेंहू के दाने के बराबर होते हैं।

रांची के पास इस पर बाँध भी है और बिजली पैदा करने का टरबाइन  भी. लेकिन यह नदी रांची के करीब से बेहद  कुरूप स्वरुप ले कर जाती है   सरकारी खतियान में स्वर्णरेखा नदी की चौडाई 24.46 मीटर है. लेकिन यह नदी हटिया और नामकुम में अब 5 मीटर से भी कम में सिमट कर रख गयी है. नगड़ी क्षेत्र में एक दर्जन से ज्यादा छोटे उदृयोग का गंदा पानी और कचरा नदी में बहाया जा रहा है. नगड़ी से हटिया तक स्वर्णरेखा के किनारे-किनारे स्थित राइस मिलों ने बहुत प्रदूषण फैला रखा है। 

राँची के स्वर्णरेखा और हरमू नदी के संगम पर स्थित प्राचीन इक्कीसो महादेव का अस्तित्व भी खतरे में है। चट्टानों में अलग-अलग आकार के शिवलिंग की आकृति नदी के अम्लीय प्रभाव से मिटते जा रहे हैं। 16 वीं शताब्दी में नागवंशी राजाओं ने अपने महल के करीब 21 चट्टानों में शिवलिंग का निर्माण कराया था। राजपरिवार की दिनचर्या इन 21 शिवलिंगों में जलाभिषेक के साथ ही शुरू होती थी।

सुवर्णरेखा में जहर घोलने में जमशेदपुर जैसे औद्योगिक शहर भी पीछे नहीं हैं . स्वर्णरेखा नदी कचरे से बेहाल है। हालत की गंभीरता इसी से समझी जा सकती है कि नदी में 17 जगहों से सीवरलाइन के पाइप छोड़े गए हैं। साफ है कि प्रदूषण विभाग के सख्त निर्देश और नदियों को बचाने की योजनाएं फाइलों तक सीमित हैं और टनों कचरा प्रतिदिन स्वर्णरखा में उड़ेला जा रहा है। इस पर अक्षेस का कोई नियंत्रण नहीं है। अपार्टमेंट और नव निर्मित भवनों के सीवर लाइन क्यों स्वर्णरेखा में ही मिलते हैं, इस सवाल का अक्षेस के पास कोई जवाब नहीं है। जमशेदपुर अक्षेस के विशेष पदाधिकारी की मानें तो जमशेदपुर की शहरी आबादी 12 लाख के पार है लेकिन अक्षेस का अपना एक भी वाटर ट्रीटमेंट प्लाट नहीं है। यहाँ झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने स्वर्णरेखा नदी के भी पानी के नमूने की जांच कराई तो पता चला कि अधिकतर जगहों पर पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम पाई गई। स्वर्णरेखा नदी कई जगहों पर दूषित हो गई है। स्वर्णरेखा नदी का पानी जानवरों और मछलियों के लिए सुरक्षित नहीं है। जानवरों और मछलियों के लिए पानी में बायोलॉजिकल ऑक्सीजन डिमांड की मात्रा 1.2 मिलीग्राम से कम होनी चाहिए, जबकि 7.0 मिलीग्राम प्रति लीटर तक है। इसकी वजह से काफी संख्या में मछलियां नदी में मर रही हैं इसके साथ ही साथ जानवरों को भी कई तरह की बीमारियां हो रही हैं।इन जगहों पर लिए गए नमूने : स्वर्णरेखा नदी के पानी के नमूने नामकुम ब्रिज के पास लिए गए, जहां 3.2 मिलीग्राम प्रति लीटर से कम से कम बीओडी, टाटीसिल्वे के पास 3.3 मिलीग्राम प्रति लीटर और जमशेदपुर में 7.0 मिलीग्राम प्रति लीटर बीओडी की मात्रा हो गई है। 

जुमार नदी : जुमार नदी रांची और आसपास के क्षेत्रों में बहती थी. जिसकी चौड़ाई करीब-करीब 30 मीटर हुआ करती थी. लेकिन अब इसका भी अस्तित्व नहीं के बराबर बचा है. इसकी चौड़ाई 10 मीटर तक बचा है. हर साल सिकुड़ रही है. स्वर्णरेखा की सहायक इस नदी पर भी अस्तित्व और पहचान का संकट मंडरा रहा है। यह नदी 15 किमी शहरी और 15 किमी ग्रामीण इलाकों का सफर तय करती है। अब यह नदी एनएच-33 के किनारे सिर्फ दस मीटर चौड़ाई में सिमट गयी है। जिस नदी में सालों भर पानी रहता था, वह अब बरसाती नदी मात्र बन कर रह गयी है। भुसूर पंचायत, चिरौंदी होते हुए यह नदी स्वर्णरेखा में मिलती है। रांची- रामगढ़ रोड स्थित जुमार पुल के पास दोनों ओर नदी का अतिक्रमण हो चुका है।

पोटपोटो नदी : कांके क्षेत्र में बहने वाली पोटपोटो नदी की चौड़ाई 32 से 37 मीटर के बीच थी. जो अब सिकुड़ कर 7.5 मीटर रह गया है . पोटपोटो नदी सेंट्रल रांची में बहती हुई बोड़ेया में जुमार नदी में मिलती है। यहाँ से इसका पानी रूक्का डैम में मिल जाता है। इस नदी के बहाव क्षेत्र में अतिक्रमण कर लोगों ने घर बना लिया है. भूमाफियाओं ने कई जगह पर नदी की जमीन का सौंदा कर दिया.  

अतिक्रमण की वजह से पोटपोटो नदी एक संकरी नाली के रूप में बदल गई है। नदी तट को प्रेमनगर, चैड़ी बस्ती, चूड़ी टोला, अरसंडे से लेकर बोड़ेया तक अतिक्रमित किया जा चुका है।

करम नदी : करम नदी का बहाव मध्य रांची के 2250 वर्गफीट क्षेत्रफल में था । करम नदी के नाम पर ही करमटोली इलाके का नामकरण हुआ है। टोपोग्राफी के अनुसार करम टोली तालाब से डिस्टिलरी तालाब को जोड़ने वाली करम नदी सबसे निचली जमीनी भू-स्तर है। करम टोली और  मोरहाबादी इलाके का अतिरिक्त पानी करम नदी से होकर डिस्टिलरी तालाब होते हुए स्वर्णरेखा नदी में मिलता था। करम नदी के कारण भूगर्भ जलस्तर काफी ऊपर था। . अब तो करम नदी के उद्गम पर ही लोगों ने अपने फायदे के लिए इसकी धारा को ही बदल दिया. अभी वहां खेती कर रहे है. कई लोगों ने मकान बना लिया है.

रांची शहर के हरिहर सिंह रोड पर थोड़ी सी बरसात के चलते होने वाला जलजमावका स्ली कारण करम नदी का अतिक्रमण के कारण संकुचन ही है . सेटेलाइट चित्र बताते हैं आज जिस कर्म नदी के अस्तित्व को नकारा जा रहा है, तीन दशक पहले वह एक पुष्ट धारा थी .  सन 1961 में प्रकाशित पुस्तक “कल्चरल कन्फिग्रेशन ऑफ रांची” में करम नदी के समृद्ध अस्तित्व का विमर्श है इसी पुस्तक में पोटपोटो नदी का भी जिक्र है।

झारखण्ड के सुरम्य वन क्षेत्र और नैसर्गिक स्वरुप में यहाँ के झरनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है . जगल कम होने, विकास के नाम पर पहाड़ों को उजड़ने के दुष्परिणाम है है कि  अब अनगड़ा का जोन्हा फॉल मार्च से ही लुप्त हो रहा है. हुंडरू फॉल भी सूख जाता है. पूरे साल कल-कल बहने वाले कई जलप्रपातों की जलधारा  गर्मी शुरू होते ही पतली और कमजोर हो जाती  है. बड़े-बुजुर्ग बताते हैं कि पांच-छह दशक में उन्होंने पानी का ऐसा संकट नहीं देखा. पलामू, उत्तरी व दक्षिणी छोटानागपुर, कोल्हान या संताल परगना प्रमंडल, हर जगह एक जैसी स्थिति है. उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल की सबसे बड़ी नदी दामोदर और संताल परगना में गंगा में भी पानी कम हो गया है.

धनबाद जिले की दामोदर समेत छह नदियों में चैत्र  से पहले ही जल धारा दुबली हो जाती है. पलामू जिले में बहनेवाली सभी चार नदियां (कोयल, सदाबह, दुर्गावती और अमानत) गर्मी से बरसात के चार महीनों में पूरी तरह सूख जाती हैं. सदाबह नदी (जिसका अर्थ है सदैव बहनेवाली नदी यानी जो कभी नहीं सूखती) में भी अप्रैल के बाद  बिलकुल ही पानी नहीं बचता . दुर्गावती नदी तो बरसात थमते ही अक्तूबर में ही सूख रही है .

गुमला जिले की सभी 13 नदियां तपन शुरू होते ही जलहीन हो रही हैं. सिमडेगा की छह में तीन नदियां पूरी तरह सूख जाती हैं. इसी तरह लोहरदगा की दो में एक नदी, गढ़वा की 19 में 14 नदियां , लातेहार की सात में से किसी नदी में पानी नहीं रहता. चतरा की सभी 17 नदियां भी  अछूती नहीं और साल में छः महीने सूख  रही  हैं. यहां नदियों के बीच में बच्चे क्रिकेट खेलने लगे हैं. रामगढ़ की 11 में 10, तो कोडरमा में 12 नदियां निर्जल हो जाती हैं. हजारीबाग की 32 में छह नदियां गर्मी से पहले ही रेत का दरिया दिखती हैं. कोल्हान जिले में सबसे खराब स्थित पूर्वी सिंहभूम की नौ में से आठ नदियों में बिलकुल ही पानी नहीं रहता है. ये पूरी तरह सूख गयी हैं. ऐसा नहीं है कि झारखंड में पहली बार नदियां सूखी हैं.

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