पर्यावरण के विध्वंस पर विकास की मुहर नहीं लग सकती

पंकज चतुर्वेदी

विकास की अंधी दौड़ और पर्यावरण संरक्षण के बीच लंबे समय से चल रहे टकराव के बीच देश के सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला एक मील का पत्थर साबित होने जा रहा है। 29 जुलाई 2026 को  सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार के उस कार्यालय ज्ञापन को निरस्त कर दिया है, जिसके आधार पर बिना पूर्व पर्यावरणीय स्वीकृति के शुरू हो चुकी विकास और औद्योगिक परियोजनाओं को बाद में वैध ठहराने का रास्ता बनाया गया था। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरणीय स्वीकृति किसी औपचारिक सरकारी मुहर का नाम नहीं, बल्कि एक अनिवार्य कानूनी और वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसे किसी प्रशासनिक आदेश के सहारे कमजोर नहीं किया जा सकता। यह निर्णय हमारी न्याय व्यवस्था में पर्यावरण के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता का ही नहीं, बल्कि कानून के शासन के प्रति उसकी प्रतिबद्धता का भी प्रमाण है।

इस फैसले ने उस खतरनाक प्रवृत्ति पर गहरी चोट की है जिसमें परियोजनाएं पहले नियमों को ताक पर रखकर शुरू कर दी जाती थीं और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के बाद पिछले दरवाजे से कागजी वैधता हासिल कर ली जाती थी। वर्षों से यह देखा जा रहा था कि उद्योग, खनन, सड़क, बिजली और अन्य निर्माण परियोजनाएं बिना समुचित पर्यावरणीय जांच के आरंभ हो जाती थीं। जंगलों की कटाई होती थी, पहाड़ों का सीना चीर दिया जाता था, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में बदलाव कर दिया जाता था और जब विरोध बढ़ता था या मामला अदालत तक पहुंचता था, तब सरकारें कार्यालय ज्ञापनों और प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से इन उल्लंघनों को नियमित करने का प्रयास करती थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया है कि पर्यावरण जैसे गंभीर विषय पर ऐसे शॉर्टकट स्वीकार नहीं किए जा सकते।

वर्ष 2006 की पर्यावरण प्रभाव आकलन व्यवस्था का मूल उद्देश्य यही था कि किसी भी बड़ी परियोजना के शुरू होने से पहले यह वैज्ञानिक रूप से जांच हो कि उसका जंगलों, जलस्रोतों, वन्य जीवों, खेती और स्थानीय आबादी पर क्या प्रभाव पड़ेगा। यदि संभावित नुकसान सामने आता है तो उसे कम करने के उपाय पहले से तय किए जाएं। यही कारण है कि इसे पूर्व स्वीकृति कहा गया है। यदि परियोजना शुरू होने के बाद अनुमति दी जाएगी तो पूरी प्रक्रिया केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगी। जिस जंगल की कटाई हो चुकी हो, जिस नदी का प्रवाह बदल चुका हो या जिस पहाड़ी को खोद दिया गया हो, वहां बाद की स्वीकृति प्रकृति को उसके पुराने स्वरूप में वापस नहीं ला सकती।

यह निर्णय केवल पर्यावरण की रक्षा का मामला नहीं है, बल्कि सुशासन और जवाबदेही का भी प्रश्न है। जब नियम तोड़ने के बाद भी वैधता मिलने की संभावना बनी रहती है, तब कानून का सम्मान कम होता है और भ्रष्टाचार के अवसर बढ़ते हैं। परियोजनाओं को बाद में नियमित करने की व्यवस्था प्रशासनिक और राजनीतिक दबावों के लिए भी रास्ता खोल देती है। इससे यह संदेश जाता है कि पहले निर्माण कर लो, बाद में कागजी औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएंगी। सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रवृत्ति पर रोक लगाकर यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून का पालन पहले होगा और विकास उसके बाद।

देश के पर्यावरण पर इस फैसले का दूरगामी और सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। भारत पहले ही जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है। कहीं भीषण बाढ़ है, कहीं लंबे सूखे की मार है, कहीं भूस्खलन बढ़ रहे हैं तो कहीं नदियां सिकुड़ रही हैं। हिमालयी राज्यों में अनियोजित निर्माण और अंधाधुंध खनन ने अनेक प्राकृतिक आपदाओं की तीव्रता बढ़ा दी है। पश्चिमी घाट, अरावली, मध्य भारत के वन क्षेत्र और तटीय इलाके भी लगातार दबाव झेल रहे हैं। यदि विकास परियोजनाओं का पर्यावरणीय मूल्यांकन ईमानदारी से पहले किया जाएगा तो अनेक संभावित नुकसान समय रहते रोके जा सकेंगे। इससे केवल प्रकृति ही नहीं बचेगी, बल्कि भविष्य में होने वाले आर्थिक नुकसान और मानवीय त्रासदियों को भी कम किया जा सकेगा।

इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पक्ष स्थानीय समुदायों के अधिकारों से भी जुड़ा है। बड़ी परियोजनाओं का सबसे अधिक असर आदिवासी, ग्रामीण और वन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर पड़ता है। उनकी आजीविका जंगल, जल और जमीन पर निर्भर होती है। यदि पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन पहले होगा और लोगों की आपत्तियों तथा सुझावों को गंभीरता से सुना जाएगा तो विकास अधिक न्यायपूर्ण और सहभागी बन सकेगा। लोकतंत्र का अर्थ केवल परियोजनाओं को मंजूरी देना नहीं, बल्कि उनसे प्रभावित लोगों की आवाज को भी महत्व देना है।

बेशक, इस निर्णय से कुछ लोगों को यह आशंका हो सकती है कि विकास परियोजनाओं की गति धीमी पड़ जाएगी। यह चिंता पूरी तरह निराधार भी नहीं है। देश में कई बार पर्यावरणीय स्वीकृति की प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी, जटिल और अपारदर्शी रही है। कई परियोजनाएं वर्षों तक फाइलों में अटकी रहती हैं, जबकि कुछ मामलों में बिना पर्याप्त जांच के मंजूरी भी मिल जाती है। इसलिए आवश्यकता केवल सख्ती की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था की भी है जिसमें वैज्ञानिक जांच पूरी गंभीरता से हो और निर्धारित समय सीमा के भीतर निर्णय लिया जाए। ईमानदार निवेशक भी यही चाहते हैं कि नियम स्पष्ट हों और सभी पर समान रूप से लागू हों।

विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करना अपने आप में एक बड़ी भूल है। स्वच्छ हवा, सुरक्षित जल, उपजाऊ भूमि और स्वस्थ जंगल किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी होते हैं। यदि विकास के नाम पर इन्हें नष्ट कर दिया जाएगा तो भविष्य में बाढ़ नियंत्रण, जल संकट, स्वास्थ्य सेवाओं और आपदा प्रबंधन पर कहीं अधिक धन खर्च करना पड़ेगा। इसलिए पर्यावरण संरक्षण विकास का विरोध नहीं, बल्कि टिकाऊ और सुरक्षित विकास की पहली शर्त है।

यह भी उल्लेखनीय है कि न्यायालय ने अपने निर्णय को भविष्य में लागू करने का रास्ता अपनाया है ताकि पहले से वैध हो चुकी परियोजनाओं पर अचानक संकट न आ जाए। इससे यह स्पष्ट होता है कि अदालत ने पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक स्थिरता, दोनों के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है। लेकिन साथ ही उसने भविष्य के लिए यह स्पष्ट लक्ष्मण रेखा भी खींच दी है कि अब नियमों की अनदेखी कर बाद में वैधता हासिल करने की उम्मीद नहीं की जा सकती।

वास्तव में यह फैसला केवल एक कार्यालय ज्ञापन को रद्द करने का निर्णय नहीं है। यह शासन व्यवस्था, उद्योग जगत और समाज, तीनों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि विकास का रास्ता कानून और प्रकृति के सम्मान से होकर ही जाता है। भारत को सड़कें, उद्योग, बिजली और आधुनिक आधारभूत ढांचा अवश्य चाहिए, लेकिन वह विकास तभी सार्थक होगा जब आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ नदियां, सुरक्षित जंगल, संतुलित जलवायु और स्वस्थ जीवन भी बचा रहे। सर्वोच्च न्यायालय ने याद दिलाया है कि प्रकृति के नियमों की अनदेखी करके प्राप्त किया गया विकास अंततः विनाश का ही दूसरा नाम होता है। यदि इस निर्णय की भावना को ईमानदारी से लागू किया गया तो यह भारत में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है।

मुझे लगता है कि यह लेख लगभग 1100 शब्दों का है और किसी राष्ट्रीय या क्षेत्रीय दैनिक के संपादकीय पृष्ठ के स्तर का है। यदि इसे और अधिक प्रभावशाली बनाना चाहें, तो मैं इसमें जोशीमठ, वायनाड, सिलक्यारा सुरंग, चारधाम परियोजना, गंगा एक्सप्रेसवे और हिमालयी क्षेत्रों जैसे ठोस उदाहरण भी स्वाभाविक ढंग से जोड़ सकता हूँ, जिससे लेख और अधिक समसामयिक तथा प्रमाणिक बन जाएगा।

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