वैश्विक सर्वोत्तम मॉडल के साथ भारत के लिए वैज्ञानिक समाधान
अजय सहाय
वर्ष 2025 में भारत के विभिन्न महानगरों जैसे दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद, कोलकाता, गुरुग्राम, पुणे, जयपुर आदि में आई भीषण शहरी बाढ़ केवल अत्यधिक वर्षा की तीव्रता का परिणाम नहीं थी, बल्कि यह भारत की विफल शहरी जल योजना, वेटलैंड के विनाश, भूजल पुनर्भरण की असफलता, वर्षा जल संचयन की उपेक्षा, अवैज्ञानिक शहरीकरण तथा जलवायु परिवर्तन की तीव्र अभिव्यक्ति का मिश्रित परिणाम थी ।
यह स्थिति वर्ष 2047 के जल आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के लिए गहरी चेतावनी है, क्योंकि भारत में हर वर्ष औसतन 4000 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) वर्षा जल गिरता है लेकिन केवल 800 BCM जल ही संरक्षित होता है, जबकि शेष 3200 BCM जल या तो समुद्र में बह जाता है या शहरी बाढ़ का कारण बनता है ।
जिससे भूजल स्तर भी नहीं बढ़ता और जल संकट भी गहराता है; समस्या का मूल कारण यह है कि भारत के अधिकांश शहरों में भूमि की ऊपरी सतह कंक्रीट और डामर से ढकी हुई है, जिससे भूमि का जल सोखने की क्षमता (infiltration rate) घटकर 10–15 मिमी/घंटा रह गई है जबकि वर्षा की तीव्रता कई बार 100 मिमी/घंटा तक हो जाती है, जिससे पानी जमीन में समाने की बजाय सतह पर एकत्र होकर जलभराव और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न करता है, और यह स्थिति तब और विकराल हो जाती है जब वेटलैंड समाप्त हो चुकी होती हैं ।
Wetlands International South Asia, ISRO, CPCB, MoEFCC आदि की रिपोर्टों के अनुसार दिल्ली में 1990 के आसपास 8000 हेक्टेयर वेटलैंड क्षेत्र था जो अब 2500 हेक्टेयर से भी कम है, चेन्नई में 1980 में 600 वेटलैंड थे जो अब केवल 60, बेंगलुरु में 1960 में 3000 झीलें (~40,000 हेक्टेयर) थीं जो अब 93 झीलें (~6000 हेक्टेयर) रह गई हैं, मुंबई में 1970 में ~15,000 हेक्टेयर वेटलैंड था जो अब 5000 हेक्टेयर रह गया है, कोलकाता में 1980 के 12,500 हेक्टेयर ईस्ट कोलकाता वेटलैंड अब 7000 हेक्टेयर, हैदराबाद के 3500 से अधिक वेटलैंड (~12,000 हेक्टेयर) अब 500 (~2,500 हेक्टेयर), गुरुग्राम का 2000 हेक्टेयर अब 600, पुणे का 4000 से घटकर 1200, लखनऊ का 1500 से घटकर 500, और भोपाल का 5000 से घटकर 2500 हेक्टेयर रह गया है, जिससे न केवल जलभराव की स्थिति उत्पन्न होती है बल्कि भूजल पुनर्भरण की प्रक्रिया भी ठप पड़ जाती है।
साथ ही, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से वर्षा अब समान रूप से पूरे मानसून में बंटने के बजाय कम समय में अत्यधिक मात्रा में गिरती है जिसे वैज्ञानिक भाषा में Extreme Precipitation Events कहा जाता है — IMD और IPCC के अनुसार भारत में पिछले 50 वर्षों में ऐसी घटनाएँ 60% तक बढ़ी हैं, और 2025 में ही मुंबई में 2 दिन में 315 मिमी, दिल्ली में जून-जुलाई में 600 मिमी, चेन्नई में 36 घंटे में 280 मिमी, और गुरुग्राम में 24 घंटे में 150 मिमी वर्षा हुई, जिससे सड़कों, मेट्रो, एयरपोर्ट, कॉलोनियों में बाढ़ जैसे दृश्य देखने को मिले ।
RWH की विफलता ने इस संकट को और बढ़ाया — देश के 500 से अधिक शहरों में केवल 12% भवनों में प्रभावी वर्षा जल संचयन प्रणाली है, और दिल्ली में निर्धारित 1.2 लाख भवनों में से केवल 28,000 में ही RWH सक्रिय है, जबकि नगर निगमों ने इसे केवल कागजी औपचारिकता बना रखा है; यह संकट तब और गहराता है जब शहरी मास्टर प्लान में वेटलैंड, नालों और जल मार्गों को निर्माण योग्य प्लॉट में बदल दिया गया — बेंगलुरु की पारंपरिक झील-जोड़ने वाली ‘केरे प्रणाली’, चेन्नई की झीलें, मुंबई के नाले और बांद्रा जैसे इलाके पुराने जल बहाव क्षेत्र पर बने हैं, जहाँ अब जल का मार्ग नहीं है ।
अतः अब आवश्यकता है कि भारत शहरी जल प्रबंधन के लिए वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं (Global Best Practices) को वैज्ञानिक रूप से अपनाए — जैसे नीदरलैंड का “Room for the River” प्रोग्राम जिसमें फ्लड ज़ोन को संरक्षित किया गया और रोटरडैम में Water Plaza Benthemplein जैसी संरचनाएँ बनाई गईं जो सामान्य समय में पार्क और वर्षा के समय 10,000 क्यूबिक मीटर पानी को संग्रहित करती हैं, सिंगापुर में ABC Waters Programme के तहत वर्षा जल को Rain Gardens, Porous Pavements, Stormwater Tanks से भूजल में डाला जाता है ।
दक्षिण कोरिया के Cheonggyecheon Stream Project में नदी को पुनर्जीवित कर शहर में बहने दिया गया, जापान के टोक्यो शहर ने G-Cans Project से 32 मीटर ऊँचे भूमिगत टावर और सुरंगें बनाकर वर्षा जल को नियंत्रित किया जिससे वहां कभी जलभराव नहीं होता, इज़राइल में हर भवन में RWH अनिवार्य है और शहरों को जल पुनर्भरण से जोड़ा गया है ।
भारत के लिए यह अनिवार्य है कि उपरोक्त नवाचारों को अपनाते हुए प्रत्येक शहर में “One Building One RWH”, “One Ward One Recharge Zone”, “One School One Rain Garden”, Vertical Recharge Shafts, Urban Sponge City Model, Open Rain Trenches, और Permeable Pavements को योजना में शामिल करे, नगर निगम भवन उपविधियों में प्रत्येक 1000 वर्गमीटर क्षेत्र में कम से कम 10% भूमि को groundwater recharge zone घोषित किया जाए ।
ISRO, IIT, CGWB और राज्य सरकारें मिलकर Urban Flood Zonation Map, वेटलैंड की GPS Mapping, Encroachment Removal, Pollution Mitigation, और Miyawaki Plantation की योजना तैयार करें, और जनता की भागीदारी हेतु Wetland Mitra Scheme, RWH Champion Award, Urban Water Literacy Curriculum शुरू करें ।
यदि भारत के शहर उपरोक्त अंतरराष्ट्रीय उपायों और वैज्ञानिक समाधानों को सटीक नीति के साथ अपनाते हैं, तो वे न केवल बाढ़ से मुक्त होंगे बल्कि वर्ष 2047 तक जलवायु-लचीले, भूजल पुनर्भरण सक्षम, और जल आत्मनिर्भर भी बन सकेंगे, जिससे सतत विकास, जल सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में भारत अग्रणी बन सकेगा ।