नमामि गंगे से आगे गंगा को जीवित माँ का संवैधानिक दर्ज़ा क्यों आवश्यक
नमामि गंगे से आगे गंगा को जीवित माँ का संवैधानिक दर्ज़ा क्यों आवश्यक

नमामि गंगे से आगे

गंगा को जीवित माँ का संवैधानिक दर्ज़ा क्यों आवश्यक

अजय सहाय

गंगा नदी को भारत की आत्मा और संस्कृति की धुरी कहा जाता है, जिसे करोड़ों लोग माँ का दर्जा देते हैं, किंतु विडंबना यह है कि जब राज्य और केंद्र सरकारें बड़े-बड़े अभियानों जैसे नमामि गंगे चला सकती हैं, हजारों करोड़ रुपये खर्च कर सकती हैं, स्वच्छता और प्रदूषण नियंत्रण के लिए योजनाएँ बना सकती हैं, तब भी गंगा को “जीवित इकाई” या Living Entity का कानूनी दर्ज़ा देने के लिए तैयार नहीं हैं, क्योंकि यह केवल भावनात्मक या धार्मिक मुद्दा नहीं बल्कि गहरे कानूनी, प्रशासनिक, राजनीतिक और आर्थिक पहलुओं से जुड़ा है ।

नमामि गंगे अभियान 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रारंभ किया गया था, जिसका उद्देश्य गंगा का शुद्धिकरण, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स का निर्माण, नदी तटीय अतिक्रमण हटाना, घाटों का सौंदर्यीकरण, ग्रामीण क्षेत्रों में शौचालय निर्माण, उद्योगों के अपशिष्ट नियंत्रण और जैव विविधता संरक्षण था ।

इस पर 30,000 करोड़ रुपये से अधिक का व्यय भी हुआ, इसमें “गंगा ग्राम” योजना, “गंगा प्रहरियों” की नियुक्ति और स्थानीय युवाओं की सहभागिता जैसी पहलें भी शामिल हुईं, किंतु बावजूद इसके CPCB (केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड) की 2023–24 की रिपोर्ट के अनुसार गंगा के कई हिस्सों में BOD (Biochemical Oxygen Demand) अभी भी मानक से ऊपर है, DO (Dissolved Oxygen) का स्तर गिरा हुआ है और 10 से अधिक प्रमुख शहरी केंद्रों से प्रतिदिन करोड़ों लीटर बिना शुद्ध किया गया सीवेज गंगा में जा रहा है ।

यही कारण है कि NGT और CPCB को 2014 के बाद बार-बार राज्य सरकारों और उद्योगों पर Environmental Compensation (EC)/जुर्माना लगाना पड़ा, परंतु ठोस अधिनियम न होने से उल्लंघन दोहराए जाते रहे; उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में गंगा तटीय टैनरियों पर सबसे बड़ा दंड लगाया गया—NGT ने नवंबर 2019 के आदेशों में कानपुर–रानिया/राखी मंडी क्षेत्र की 22 टैनरियों पर ₹280 करोड़ का जुर्माना ठोका, साथ ही UPPCB पर ₹1 करोड़ और UP जल निगम पर ₹1 करोड़ का दायित्व ठहराया ।

इसके अतिरिक्त, राज्य सरकार पर भी ₹10 करोड़ EC लगाया गया (2019–2022 में क्रोमियम डम्प्स और अनुपचारित प्रवाह के लिए), CPCB ने भी drains के लिए 2019–20 में कुल ₹19.7 करोड़ EC की माँग की जिसमें अकेले UP का हिस्सा लगभग ₹18 करोड़ था ।

उत्तराखंड में सेंचुरी पल्प ऐंड पेपर (नैनीताल) पर 2016 में ₹30 लाख का जुर्माना लगा, साथ ही 01.07.2020 से NGT के आदेशों के तहत वहाँ भी हर अपशिष्ट नाले/अधूरे STP पर ₹10 लाख प्रति माह का EC नियम लागू हुआ; बिहार में CPCB ने अगस्त 2020 में ~₹1.2 करोड़ EC माँगा (NGT निर्देश 2019 के आधार पर), वहीं नवंबर 2024 में NGT ने राज्य के 8 में से 6 STP के मानकों पर खरे न उतरने और लगभग 750 MLD अनुपचारित सीवेज गंगा में गिरने पर सख्त टिप्पणियाँ कीं ।

पश्चिम बंगाल में जंगीपुर ड्रेन पर नवंबर 2019–फरवरी 2020 अवधि के लिए लगभग ₹20 लाख EC का आकलन हुआ, और फरवरी 2024 में NGT ने चेतावनी दी कि पूरे WB stretch का जल स्नानयोग्य नहीं है, यहाँ 258.67 MLD सीवेज अनुपचारित गिर रहा है—यदि सुधार न हुआ तो दंड लगेगा ।

झारखंड में CPCB ने 2020 के आकलन में drains का EC “शून्य” दर्ज किया क्योंकि कुछ ड्रेन्स टैप हो चुके थे, परंतु 2024 में प्रक्रियात्मक लापरवाही पर NGT ने राज्य पर ₹50,000 और चार DMs पर ₹10,000-₹10,000 का दंड लगाया ।

इन आँकड़ों से स्पष्ट है कि उद्योगों और राज्यों पर दंड तो लगते हैं, परंतु जब तक गंगा को जीवित इकाई का दर्जा नहीं मिलेगा तब तक यह सब “केस-बाय-केस” दंड व्यवस्था ही रहेगी और बार-बार उल्लंघन होते रहेंगे; इसके विपरीत विश्व स्तर पर उदाहरणों ने साबित किया है कि जब नदियों को कानूनी अधिकार मिलते हैं तो उनकी स्थिति में ठोस सुधार होता है—न्यूज़ीलैंड की वांगानुई नदी को “Te Awa Tupua (Whanganui River Claims Settlement) Act, 2017” के तहत जीवित इकाई घोषित किया गया, जिसमें Te Pou Tupua निकाय बना और सरकार व माओरी समाज के प्रतिनिधि संरक्षक नियुक्त हुए ।

कोलंबिया की अत्रातो नदी (2016), अमेज़न (2018), बांग्लादेश की सभी नदियाँ (2019), कनाडा की मैग्पी नदी (2021), अमेरिका की क्लैमथ नदी और हाल ही में इंग्लैंड की रिवर टेस्ट (2025) को अधिकार मिले; इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि नदियों का संरक्षण तभी संभव है जब उन्हें व्यक्ति की तरह अधिकार मिले ।

भारत में 2017 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गंगा और यमुना को जीवित इकाई घोषित किया था, किंतु सुप्रीम कोर्ट ने प्रशासनिक अस्पष्टता और जिम्मेदारी तय न होने के कारण उस पर रोक लगा दी; यदि वास्तव में गंगा को बचाना है तो केवल नमामि गंगे जैसी योजनाओं से काम नहीं चलेगा, बल्कि संसद को एक “गंगा जीवनाधिकार विधेयक” लाना होगा, जिसमें गंगा को “जीवित माँ” का दर्जा मिले, नदी न्यायाधिकर परिषद बने, नदी पंचायतें गठित हों, प्रदूषकों से वसूले गए दंड से विशेष कोष बने, और किसी भी उद्योग या परियोजना को गंगा से अनुमति लेना अनिवार्य हो ।

यहाँ यह स्पष्ट समझना होगा कि नमामि गंगे दरअसल एक नीतिगत ढाँचा (policy framework) है, जिसकी सीमाएँ हैं क्योंकि यह केवल कार्यक्रमों और योजनाओं तक सीमित है—यह short-term solution है जो केवल आंशिक सुधार लाता है; इसके विपरीत गंगा को Living Entity का दर्जा देना इसे सीधे संवैधानिक शक्ति (constitutional power) प्रदान करता है, जिससे गंगा केवल एक नदी नहीं बल्कि एक संविधान-प्रदत्त अधिकारों वाली इकाई बन जाएगी । अदालतों में स्वतन्त्र पक्षकार बन सकेगी और उसके साथ किसी भी प्रकार का उल्लंघन दीर्घकालिक (long-term) समाधान की दिशा में नियंत्रित किया जा सकेगा ।

वैज्ञानिक दृष्टि से गंगा को कानूनी दर्जा देना आवश्यक है क्योंकि यह 2500 किमी लंबी नदी हिमालयी ग्लेशियर, मानसूनी वर्षा और भूजल से पोषित होती है, इसके बेसिन में 500 मिलियन से अधिक लोग रहते हैं, यह भारत की GDP का लगभग 40% योगदान करती है, और यदि यह प्रदूषित या अवरुद्ध हो गई तो भारत का आधा भूभाग संकट में आ जाएगा; सामाजिक दृष्टि से देखें तो गंगा भारत के 5 राज्यों की करोड़ों जनता की आजीविका, कृषि, मत्स्य पालन और धार्मिक जीवन से जुड़ी है ।

सांस्कृतिक दृष्टि से यह मोक्षदायिनी है, आर्थिक दृष्टि से यह खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा की आधारशिला है, और पर्यावरणीय दृष्टि से यह जैव विविधता की धमनियों में से एक है; इसलिए निष्कर्ष यह है कि गंगा के प्रदूषण पर NGT और CPCB द्वारा लगाए गए जुर्माने (जैसे UP की टैनरियों पर ₹280 करोड़) केवल आंशिक उपचार हैं, नमामि गंगे जैसे अभियानों से केवल अल्पकालिक सुधार संभव है, जबकि स्थायी समाधान तभी होगा जब गंगा को जीवित इकाई का संवैधानिक दर्ज़ा मिलेगा और उसके अधिकार कानून में सुरक्षित होंगे ।

तभी 2047 तक “जल आत्मनिर्भर भारत” का सपना साकार हो सकेगा और गंगा सचमुच नदी नहीं, जीवित माँ बन पाएगी।