आस्था और वास्तविकता के बीच गंगा ऋषिकेश–हरिद्वार में स्नान योग्य जल पर वैज्ञानिक सवाल
आस्था और वास्तविकता के बीच गंगा ऋषिकेश–हरिद्वार में स्नान योग्य जल पर वैज्ञानिक सवाल

आस्था और वास्तविकता के बीच गंगा

ऋषिकेश–हरिद्वार में स्नान योग्य जल पर वैज्ञानिक सवाल

अजय सहाय

ऋषिकेश और हरिद्वार, जो कि गंगा नदी के हिमालयी उद्गम क्षेत्र के सबसे पवित्र और प्रमुख तीर्थ स्थल माने जाते हैं, वहाँ गंगा का जल सामान्य धारणा के विपरीत कई स्थानों पर स्नान (Bathing) के लिए भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं रह गया है, और यह विषय इसलिए संवेदनशील है क्योंकि धार्मिक आस्था और वैज्ञानिक तथ्यों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक हो जाता है।  

वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए तो गंगा का जल ऋषिकेश तक आते-आते अपेक्षाकृत स्वच्छ रहता है क्योंकि यहाँ तक नदी का प्रवाह तीव्र (1–2 m/s), तापमान कम (10–15°C) और घुलित ऑक्सीजन (DO) का स्तर उच्च (8–10 mg/L) होता है, जो जैविक प्रदूषण को नियंत्रित करता है, परंतु जैसे ही नदी हरिद्वार और आगे के मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती है, उसका वेग कम (0.3–0.6 m/s) हो जाता है, तापमान बढ़ता है (20–28°C), और मानव गतिविधियाँ तेजी से बढ़ती हैं, जिससे जल गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।  

Central Pollution Control Board (CPCB) के मानकों के अनुसार स्नान योग्य जल के लिए फीकल कोलीफॉर्म (Fecal Coliform) की सीमा 500 MPN/100 ml निर्धारित की गई है, लेकिन विभिन्न मॉनिटरिंग रिपोर्टों (CPCB 2022–2024, National Mission for Clean Ganga) के अनुसार हरिद्वार के कुछ घाटों पर यह स्तर कई बार 2,000 से 10,000 MPN/100 ml तक दर्ज किया गया है, जो सुरक्षित सीमा से 4–20 गुना अधिक है, जबकि ऋषिकेश में भी त्योहारों और भीड़भाड़ के समय यह स्तर 1,000–3,000 MPN/100 ml तक पहुँच जाता है।

फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया मुख्यतः मानव और पशु मल से उत्पन्न होते हैं और इनके अधिक होने का अर्थ है कि पानी में रोगजनक (Pathogens) जैसे E. coli, Salmonella और Vibrio cholerae की उपस्थिति की संभावना अधिक है, जिससे जलजनित रोग (Typhoid, Cholera, Diarrhea) का खतरा बढ़ जाता है।

इसके पीछे सबसे बड़ा वैज्ञानिक कारण है सीवेज (Sewage) का अपर्याप्त उपचार—हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे शहरों में प्रतिदिन लगभग 80–120 MLD (Million Litres per Day) सीवेज उत्पन्न होता है, जिसमें से 20–30% बिना पूर्ण उपचार के सीधे गंगा या उसकी सहायक नालियों में गिर जाता है, क्योंकि STP (Sewage Treatment Plant) की क्षमता या तो पर्याप्त नहीं है या उनका संचालन 60–70% दक्षता पर ही होता है।

दूसरा बड़ा कारण है तीर्थ और पर्यटन दबाव—हर वर्ष कुंभ मेला, कांवड़ यात्रा और अन्य धार्मिक आयोजनों के दौरान लाखों श्रद्धालु एक ही समय में नदी में स्नान करते हैं, जिससे जैविक लोड (Biological Load) अचानक कई गुना बढ़ जाता है, उदाहरण के लिए कुंभ के दौरान एक दिन में 50 लाख से अधिक लोग स्नान करते हैं, जिससे मानव शरीर से निकलने वाले सूक्ष्म जैविक पदार्थ (Skin microbes, sweat, साबुन, तेल) सीधे जल में मिल जाते हैं।  

तीसरा कारण है ठोस अपशिष्ट (Solid Waste) और धार्मिक सामग्री—फूल, माला, कपड़ा, राख, प्लास्टिक आदि नदी में डाले जाते हैं, जिससे Biochemical Oxygen Demand (BOD) बढ़ जाता है; CPCB के अनुसार स्नान योग्य जल के लिए BOD 3 mg/L से कम होना चाहिए, जबकि हरिद्वार के कुछ स्थानों पर यह 4–6 mg/L तक पाया गया है, जो यह दर्शाता है कि पानी में जैविक प्रदूषण अधिक है और ऑक्सीजन की खपत बढ़ रही है।

चौथा महत्वपूर्ण कारण है नालों (Drains) का सीधा प्रवाह—हरिद्वार में 10–15 प्रमुख नाले बिना पर्याप्त उपचार के गंगा में गिरते हैं, जिनमें BOD 20–80 mg/L और फीकल कोलीफॉर्म लाखों MPN/100 ml तक हो सकता है, जो नदी के जल को तुरंत प्रभावित करता है।

पाँचवाँ कारण है नदी के प्राकृतिक “Self-Purification” सिस्टम का कमजोर होना—पहले गंगा का प्रवाह (E-flow) अधिक था, जिससे प्रदूषक तेजी से dilute हो जाते थे, लेकिन अब बांधों और बैराज (जैसे भीमगोडा बैराज) के कारण पानी का प्रवाह नियंत्रित हो गया है, जिससे dilution क्षमता 30–40% तक घट गई है और प्रदूषक अधिक समय तक नदी में बने रहते हैं।  

छठा कारण है शहरीकरण और भूमि उपयोग परिवर्तन—ऋषिकेश और हरिद्वार में तेजी से होटल, आश्रम और कॉलोनियाँ विकसित हुई हैं, जिनका सीवेज और greywater (रसोई, बाथरूम का पानी) अक्सर सीधे नदी में पहुँच जाता है।

सातवाँ कारण है माइक्रोप्लास्टिक और केमिकल प्रदूषण—हाल के अध्ययनों (IIT Roorkee, NEERI) के अनुसार गंगा के जल में माइक्रोप्लास्टिक कण 100–300 particles/m³ तक पाए गए हैं, जो मानव स्वास्थ्य के लिए दीर्घकालिक खतरा हैं और जल की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं।

आठवाँ कारण है नदी के किनारे वनस्पति (Riparian Vegetation) की कमी—वैज्ञानिक रूप से पेड़ों की छाया वाष्पीकरण को 20–40% तक कम करती है और उनकी जड़ें फिल्ट्रेशन में मदद करती हैं, लेकिन शहरी विस्तार के कारण यह प्राकृतिक फिल्टर सिस्टम कमजोर हो गया है।

नौवाँ कारण है अस्थायी शौच और खुले में मलत्याग—कांवड़ यात्रा और अन्य मेलों के दौरान अस्थायी शौचालयों की कमी के कारण फीकल प्रदूषण बढ़ जाता है।

दसवाँ कारण है जल तापमान में वृद्धि और जलवायु परिवर्तन—जब तापमान बढ़ता है तो बैक्टीरिया की वृद्धि दर (growth rate) 2–3 गुना तक बढ़ जाती है, जिससे फीकल कोलीफॉर्म तेजी से multiply करते हैं।

वैज्ञानिक रूप से यह भी देखा गया है कि जब DO स्तर 5 mg/L से नीचे जाता है तो self-purification क्षमता कम हो जाती है और pathogens अधिक समय तक जीवित रहते हैं; World Health Organization के अनुसार यदि पानी में फीकल कोलीफॉर्म 1,000 MPN/100 ml से अधिक हो तो वह सीधे मानव संपर्क (जैसे स्नान) के लिए भी जोखिमपूर्ण माना जाता है; इसके अलावा National Green Tribunal ने भी कई मामलों में यह टिप्पणी की है कि गंगा के विभिन्न हिस्सों में untreated sewage प्रमुख प्रदूषण स्रोत है और राज्यों को इसे नियंत्रित करने के निर्देश दिए हैं।

हालांकि यह भी महत्वपूर्ण है कि गंगा में “bacteriophages” नामक प्राकृतिक वायरस पाए जाते हैं, जो कुछ हद तक हानिकारक बैक्टीरिया को नष्ट करते हैं, इसी कारण गंगा के जल में ऐतिहासिक रूप से self-purification की क्षमता रही है, परंतु वर्तमान में प्रदूषण का स्तर इतना अधिक हो गया है कि यह प्राकृतिक प्रणाली भी पर्याप्त नहीं रह गई है।

समाधान की दृष्टि से देखा जाए तो Namami Gange के अंतर्गत कई STP बनाए गए हैं, जैसे हरिद्वार में 68 MLD और ऋषिकेश में 26 MLD की क्षमता के प्लांट, लेकिन इनकी पूर्ण क्षमता से संचालन, नालों का interception, real-time water quality monitoring (RTWQM), और community participation अत्यंत आवश्यक है।

निष्कर्षतः यह कहना वैज्ञानिक रूप से उचित है कि गंगा का जल ऋषिकेश और हरिद्वार में पूरी तरह “अस्नान योग्य” नहीं है, बल्कि कई स्थानों और समयों (विशेषकर भीड़भाड़ और मानसून के बाद) में यह CPCB मानकों से बाहर चला जाता है, जिसका मुख्य कारण केवल फीकल कोलीफॉर्म नहीं बल्कि सीवेज, BOD, E-flow की कमी, ठोस अपशिष्ट, माइक्रोप्लास्टिक और शहरी दबाव का संयुक्त प्रभाव है।

इस संवेदनशील विषय को धार्मिक आस्था के साथ संतुलित करते हुए वैज्ञानिक तथ्यों और डेटा के आधार पर समझना और समाधान की दिशा में कार्य करना ही सबसे महत्वपूर्ण कदम है।