यह तो जान लें कि उनकी जरूरत क्या है ?
पंकज चतुर्वेदी
देश का अन्नपूर्णा बीते कई दशकों की सबसे भयावह बाढ़ से जूझ रहा हैं । गाँव के गाँव बह गए, घरों में कुछ नहीं बचा, खेतों में फसल की जगह बालू ने घर बना लिया । देश के सीमावर्ती राज्य पंजाब के यह दुखी करने वाले हालात केवल पानी उतरने तक नहीं हैं । जब नदियाँ अपने घर लौट जाएँगी तो पांच नदियों के इस राज्य की दिक्कतें और बढेंगी । सारा देश पंजाब के साथ खड़ा है और मदद के लिए हाथ बढ़ा रहा हैं ।
अतीत में देखें तो जब-तब देश के किसी हिस्से में बाढ़ आई और आम लोगों में सहयोग के लिए समान जुटाया तो उसमें से अधिकाँश सामग्री लोगों के काम ही नहीं आई । भले ही उनकी भावना अच्छी हो लेकिन यह जानने का कोई प्रयास नहीं किया गया कि आज वहां तत्काल किस चीज की जरूरत हैं और आने वाले महीनों या साल में कब क्या अनिवार्य होगा ।
पाकिस्तान की सीमा से लगे, खेती और पशुधन से संपन्न पंजाब में नदियों- नालों में आये उफान के कारण तीन लाख एकड़ (लगभग 1.2 लाख हेक्टेयर) से ज्यादा फसली जमीन को नुकसान हुआ है। सबसे ज्यादा असर धान, मक्का, सब्जियां, और अन्य खरीफ फसलों पर हुआ है। सीमा से लगे गुरदासपुर, पठानकोट, होशियारपुर, जालंधर, फाजिल्का, कपूरथला व आसपास के गाँवों में घर, सड़क और दुकानें पानी में डूब गई हैं।
अब तक 29 लोगों की मौत हुई है और करीब 2.56 लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। पंजाब का समाज बहुत जीवट वाला है लेकिन आज वहां हुई तबाही को देखते हुए बड़ी मात्र में इमदाद जरूरी है । कई हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका ऐसा है जहां आने वाले कई महीनों तक पानी व उसके साथ आई रेत व गाद जमा रहेगी ।
पानी में फंसे लोगों के लिए भोजन तो जरूरी है ही और उसकी व्यवस्था स्थानीय सरकार व कई जन संगठन कर रहे हैं, लेकिन इस बात पर कम ध्यान है कि वहां पीने के लिए साफ पानी की बहुत कमी है । आसपास एकत्र पानी बदबूदार है, राज्य के सभी वाटर ट्रीटमेंट प्लांट बंद पड़े हैं और यदि ऐसे में गंदा पानी पिया तो हैजा फैलने का खतरा है ।
वहां लाखों बोतल पेयजल की रोज की मांग के साथ-साथ तो बगैर बिजली वाले फिल्टर, बड़े आरओ, बैटरी, इन्वर्टर व आम लोगों के लिए मोमबत्तियां व माचिस की वहां बेहद जरूरत है । कारण, वहां बिजली की सप्लाई सामान्य करने में बहुत से अडंगे हैं। बिजली के तार खंभे, इन्सुलेटर व उसे स्थापित करने वाला स्टाफ …. महीनों का काम है। ऐसे में छोटे जनरेटर, इन्वर्टर, बेहद अनिवार्य हैं। इसके अलावा पानी भरे इलाकों मने किसी महामारी को रोकने के लिए फिनाईल, क्लोरिन पाउडर , मच्छर मारने के स्प्रे और क्रीम आदि भाई चाहिए .
जब बारिश रुकेगी तो उन गलियों-मुहल्लें में भरे पानी को निकालना, कीचड़ हटाना, मरे जानवरों व इंसानों का निस्तारण करना और सफाई करना सबसे बड़ा काम है। इसके लिए तत्काल जरूरत है पानी के बड़े पंपों की, जेसीबी मशीन, टिप्पर व डंपर की, ईंधन की, गेती-फावड़ा दस्ताने, गम बूट की ।
जब तक गंदगी, मलवा, पानी हटेगा नहीं, तब तक जीवन को फिर से पटरी पर लाना मुश्किल है। यह भी तय है कि किसी भी सरकारी सिस्टम में इतनी भारी व महंगी मशीने तत्काल खरीदना संभव नहीं होता । यदि समाज के लोग इस तरह के औजार-उपकरण खरीद कर राज्य सरकार को भेंट दें तो पुनर्वास कार्य सही दिशा में चल पाएंगे ।
ऐसा नहीं है कि बड़ी व्यवस्थाएं जुटाने के लिए आम, पीड़ित लोगों का ध्यान ही नहीं रखा जाए । हजारों लोग ऐसे हैं जो कि मधुमेह, ब्लड प्रेशर, थायराईड जैसी ऐसी बीमारियों से पीड़ित हैं जिन्हें नियमित दवाई लेना होता है और बाढ़ उनकी सारी दवा बहा कर ले गई है । इसके अलावा अपना सब कुछ लुटने का ट्रोमा, राहत शिविरों की सीमित व्यवस्था के चलते मानसिक रूप से अव्यवस्थित लोगों की संख्या भी बढ़ रही है ।
इन लोगों के लिए उनकी नियमित दवाएं, पीने के पानी की बोतलें, डेटाल, फिनाईल, नेफथेलीन की गोलियां, क्लोरिन की गोलियां, पेट में संक्रमण, बुखार जैसी बीमारियों की दवाएं, ग्लूकोज पाउडर, सेलाईन, औरतो के लिए सेनेटरी नेपकीन, फिलहाल तत्काल जरूरत की चीजें हैं। अब यदि आम लोग अपने घर के पुराने ऊनी कपडों की गठरियां या गेंहू चावल वहां भेजेंगे तो तत्काल उसका इस्तेमाल हो नहीं पाएगा ।
यदि हकीकत में ही कोई कुछ बड़ी मदद करना चाहता है तो दूरस्थ अंचलों में नव निर्माण के लिए सीमेंट, लोहा जैसी निर्माण सामग्री के ट्रक भेजने के संकल्प लेना होगा। फिलहाल तो पंजाब के आंचलिक गांवों से ढाई लाख लोग अपने घर से पूरी तरह विस्थापित हुए हैं । वहां के बाजार बह गए हैं । वाहन नष्ट हो गए हैं । ऐसे में हुए जान-माल के नुकसान के बीमा दावों का तत्काल व सही निबटारा एक बड़ी राहत होता है ।
चूँकि राज्य सरकार का बिखरा-लुटा-पिटा अमला अभी खुद को ही संभालने में लगा है, ऐसे में हुए नुकसान के आकलन, दावों को प्रस्तुत करना, बीमा कंपनियों पर तत्काल भुगतान के लिए दवाब बनाने आदि कार्यों के लिए बहुत से पढ़े-लिखें लोगों की वहां जरूरत है । ऐसे लोगों की भी जरूरत है जो दूरदराज में हुए माल-असबाब के नुकसान की सूचना, सही मूल्यांकन को सरकार तक पहुंचा सकें व यह सुनिश्चित करें कि केंद्र या राज्य सरकार की किन योजनाओं का लाभ उन्हें मिल सकता है।
पानी उतरने पर जीवन को फिर से पटरी पर लाना भी गंभीर समस्या होगी क्योंकि सरकारी राहत का पैसा बैंक खाते में जाएगा और उसी खाते में जाएगा जिनके पास आधार कार्ड है । इसके लिए भी तो कोई फार्म भरा जाएगा । जिसका घर व सामान सबकुछ बाढ़ में बह गया, उसके पास आधार तो होने से रहा, फिर जब भूख आज लगी है तो राहत का एक महीने बाद मिला पैसा किस काम का? ऐसे में लोगों को उनकी पहचान के कागजात उपलब्ध कराने के कार्य के लिए ढेर सारे स्वयं सेवकों को आगे आना होगा, जोकि दिल्ली या अन्य शहर में बैठ कर उनके डुप्लीकेट आधार आदि कंप्यूटर से निकाल कर उन तक पहुंचा सकें ।
एक महीने के भीतर जब हालात कुछ सुधरेंगे तो स्कूल व शिक्षा की याद आएगी और तब पता चलेगा कि सैलाब में स्कूल, बच्चों के बस्ते, किताबें सब कुछ बह गया है । इस समय कोई दो लाख बच्चों को बस्ते, कापी-किताबों, पैंसिल, पुस्तकों की जरूरत है । इस बार यदि ईद दीपावली या क्रिसमस के तोहफो में हर घर से यदि एक-एक बच्चे के लिए बस्ता, कंपास, टिफिन बाक्स, वाटर बोटल, पांच नोट बुक, पेन-पैंसिल का सैट वहां चला जाए तो पंजाब के भविष्य के सामने छाया धुंधलका छंटने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।
वहां की पाठ्य पुस्तकों को फिर से छपवाना पड़ेगा, ब्लेक बोर्ड व फर्नीचर बनवाना पड़ेगा । इसके लिए राज्य के छोटे-छोटे क्लस्टर में, मुहल्लों में संस्थागत या निजी तौर पर बच्चों के लिए काम करने की जरूरत है। इसके साथ उनके पौष्टिक आहार के लिए बिस्किट, सूखे मेवे जैसे खराब ना होने वाले भोज्य पदार्थ की मांग वहां है।
यदि आवश्यकता के अनुरूप दान या मदद ना हो तो यह समय व संसाधन दोनों का नुकसान ही होता है। यह सही है कि हमारे यहां आज तक इस बात पर कोई दिशा निर्देश बनाए ही नहीं गए कि आपदा की स्थिति में किस तरह की तात्कालिक तथा दीर्घकालिक सहयोग की आवश्यकता होती है।
असल में यह कोई दान या मदद नहीं है, हम एक मुल्क का नागरिक होने का अपना फर्ज अदा करने के लिए अपने संकटग्रस्त देशवासियों के साथ खड़े होते हैं । ऐसे में यदि हम जरूरत के मुताबिक काम करें तो हमारा सहयोग सार्थक होगा ।