शुक्र है, ‘फोर्टिफाइड’ चावल बांटने पर रोक लगी
शुक्र है, ‘फोर्टिफाइड’ चावल बांटने पर रोक लगी

शुक्र है, ‘फोर्टिफाइड’ चावल बांटने पर रोक लगी

एक बड़ी आबादी के लिए यह पोषण नहीं था और इससे उनके स्वास्थ्य पर गंभीर संकट मंडरा रहा था

सरकार ने अप्रैल 2022 में राशन में ‘फोर्टिफाइड’ चावल के वितरण को अनिवार्य कर दिया था। जनजातीय क्षेत्रों में थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया-जैसे रोगों का प्रसार व्यापक है। उन्हें भी यह चावल दिया जा रहा था। यह उन्हें गंभीर रूप से बीमार कर रहा था

पंकज चतुर्वेदी

आखिरकार, सरकार को अपने उस आदेश को वापस लेना ही पड़ा जिसके तहत विभिन्न सार्वजनिक वितरण तंत्र के जरिये ‘फोर्टिफाइड’ चावल के वितरण को अनिवार्य किया गया था। दरअसल, इस बात के कोई प्रमाण थे ही नहीं कि इस तरह तैयार चावल रक्त-अल्पता (एनीमिया ) से लड़ने में कारगर है। आईआईटी, खड़गपुर की एक रिपोर्ट में इनके भंडारण को मानव स्वास्थ्य के लिए घातक बताया गया था।

संवर्धित चावल के निर्माण की तकनीक, जिसे ’एक्सट्रूजन’ कहा जाता है, सैद्धांतिक रूप से तो सटीक लगती है, लेकिन जमीन पर इस तैयार करने में भारी खामियां हैं। कहा तो यह गया कि चावल के दानों में कृत्रिम रूप से लौह तत्व और विटामिन मिलाकर देश की एक बड़ी आबादी को ’छिपी हुई भूख’ से मुक्त किया जा सकता है।

किंतु, इस महत्वाकांक्षी योजना के पीछे छिपे स्वास्थ्य जोखिम और निर्माण प्रक्रिया की अनिश्चितता पर गंभीर विमर्श किए बिना ही इसे बांटा जाने लगा। बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण या प्रायोगिक नतीजे ही महज पायलट प्रोजेक्ट की आड़ में सारे देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये इस चावल को बड़ी आबादी के बीच बांटा जा रहा था। ये संकट के बादल हैं,  यह बात न तो वितरण करने वाली सरकार जानती थी और न ही खाने वाला।

तरीका यह था कि सबसे पहले टूटे हुए चावल के दानों को पीसकर आटा बनाया जाता था। इस आटे में आयरन (लोहा), फोलिक एसिड और विटामिन बी12 का एक निर्धारित मिश्रण मिलाया जाता था। इसमें जिंक, विटामिन ए, बी1, बी2, बी3 और बी6 भी मिलाया जा रहा था।

इस मिश्रण में पानी मिलाकर इसे एक ’एक्सट्रूडर’ मशीन में डाला जाता था जो इसे ठीक चावल के दाने जैसा आकार देती था। इन्हें फोर्टिफाइड राइस कर्नेल कहा जाता है। अंत में, इन कृत्रिम दानों को सामान्य चावल के साथ 1:100 के अनुपात में मिलाया जाता था, यानी 100 किलो सामान्य चावल में एक किलो फोर्टिफाइड दाना।

भारत में केन्द्रीय पूल में चावल का कुल भंडार लगभग 679.32 लाख टन तक पहुंच गया है, जो कि निर्धारित बफर मानदंड – लगभग 76.1 लाख टन – से 9 गुना अधिक है। इसके बावजूद  सार्वजनिक वितरण प्रणाली में ’फोर्टिफाइड’, यानी संवर्धित चावल के वितरण को अनिवार्य कर दिया जाना कई सवाल खड़े कर रहा था। देश के सभी सार्वजनिक वितरण दुकान और  आंगनवाड़ी आदि में कोई 350 लाख मीट्रिक टन फोर्टिफाइड चावल के वितरण की व्यवस्था की गई थी।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थान (आईसीएमआर) के विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि इस तरह के चावल सभी के लिए एकसमान लाभकारी नहीं हैं, खासकर थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया जैसी आनुवंशिक बीमारियों से पीड़ित लोगों के लिए तो कतई नहीं। ऐसे मरीजों के शरीर में पहले से ही आयरन की अधिकता होती है, और आयरन युक्त चावल खाने से उनके अंगों के खराब होने का खतरा बढ़ सकता है।

यह बात सरकारी रिपोर्ट में दर्ज है कि सरकार ने पायलट प्रोजेक्ट्स की विफलता को छिपाया। नीति आयोग की एक गोपनीय रिपोर्ट में कहा गया कि ये प्रोजेक्ट्स बुनियादी रूप से दोषपूर्ण हैं और ये चावल के पोषण संबंधी प्रभाव का कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं दे सके।

भारत के जनजातीय क्षेत्रों में थैलेसीमिया और सिकल सेल एनीमिया-जैसे रोगों का प्रसार व्यापक है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, इन रोगों से पीड़ित व्यक्तियों के शरीर में लौह तत्व (आयरन) का संचय प्राकृतिक रूप से अधिक होता है। ऐसे मरीजों को नियमित रूप से लौह-संवर्धित चावल खिलाया जाए, तो उनके शरीर में ’आयरन ओवरलोड’ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

यह अतिरिक्त लोहा उनके यकृत (लीवर), हृदय और गुर्दों को धीरे-धीरे नष्ट कर सकता है। विडंबना यह है कि जिन क्षेत्रों में इन बीमारियों का प्रकोप सबसे अधिक है, वहां सरकारी राशन ही भोजन का एकमात्र साधन है। इनके पैकेटों पर चेतावनी बारीक तरीके से लिखी तो होती है लेकिन ग्रामीण और निरक्षर आबादी इसे समझती तो है नहीं। आखिर, हम-आप ही मुचुअल फंड और बैंक आदि के फॉर्म भरते समय छोटे प्वाइंट में लिखे कितने निर्देश पढ़ते-समझते हैं जबकि ये जरूरी होते हैं। ऐसे ही, इन पैकेटों वाले चावल लेने से अनजाने में ही एक बड़ा वर्ग स्वास्थ्य संकट की ओर धकेला जा रहा था।

इसे एक अन्य तरीके से समझा जा सकता है। मानव आंतों में करोड़ों ’अच्छे बैक्टीरिया’ होते हैं जो पाचन और प्रतिरक्षा प्रणाली के लिए जिम्मेदार हैं। शोध बताते हैं कि जब हम ’सिंथेटिक आयरन’ (कृत्रिम लोहा) का अधिक सेवन करते हैं, तो वह पूरी तरह अवशोषित नहीं हो पाता।

बचा हुआ लोहा आंतों में हानिकारक बैक्टीरिया (जैसे ई-कोलाई) की वृद्धि में सहायक होता है, जिससे लाभकारी बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं। इससे दीर्घकाल में पाचन संबंधी गंभीर रोग उत्पन्न हो सकते हैं। शरीर में लोहे की अधिकता ’फ्री रेडिकल्स’ पैदा करती है, जिससे कोशिकाओं में ’ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस’ बढ़ता है।

यह स्थिति समय से पहले बुढ़ापा, मधुमेह और हृदय रोगों के खतरे को बढ़ा सकती है। प्राकृतिक भोजन में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट इस प्रभाव को कम करते हैं, लेकिन केवल फोर्टिफाइड चावल के सेवन से यह संतुलन बिगड़ जाता है।

टूटे हुए चावल के आटे में पोषक तत्वों का मिश्रण मिलाकर उसे मशीन से दोबारा चावल का आकार देने की प्रक्रिया में गुणवत्ता मानकों की भारी अनदेखी हो रही थी। अनेक चावल मिलों में पोषक तत्वों के मिश्रण (प्रीमिक्स) की मात्रा का सही संतुलन नहीं रखा जा रहा था – कहीं लौह तत्व की मात्रा निर्धारित सीमा से बहुत अधिक हो जाती थी, तो कहीं नगण्य।

मशीनों के अत्यधिक तापमान के कारण संवेदनशील विटामिन, जैसे विटामिन बी-12, अपनी प्रभावशीलता खो दे रहे थे। इसके अतिरिक्त, निर्माण में उपयोग किए जाने वाले कच्चे माल और रसायनों की शुद्धता पर भी कोई कड़ा नियंत्रण नहीं था।

यही कारण है कि पकाते समय इस चावल का स्वाद और गंध बदल जाता था जिससे आम जनता के मन में इसके ’प्लास्टिक चावल’ होने का भ्रम पैदा होता था और कई बार वे इसे फेंक तक देते थे।

सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में ’एक ही दवा सबको’ (यूनिवर्सल मेडिकेशन) की नीति अक्सर प्रतिकूल परिणाम देती है। एनीमिया के कई कारण हो सकते हैं, जिनमें स्वच्छता का अभाव, पेट के कीड़े या अन्य संक्रमण शामिल हैं। केवल चावल में लोहा मिलाकर पूरी आबादी को खिलाना एक अदूरदर्शी कदम प्रतीत होता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि कृत्रिम रूप से जोड़े गए खनिजों की तुलना में प्राकृतिक भोजन – जैसे, हरी सब्जियां, दालें और मोटे अनाज – से मिलने वाले पोषक तत्व शरीर में बेहतर अवशोषित होते हैं।

भंडारण के दौरान नमी और तापमान के कारण इन कृत्रिम दानों में ऑक्सीकरण (ऑक्सीडेशन) की प्रक्रिया शुरू हो सकती है, जो चावल को विषाक्त बना सकती है। गुणवत्ता ऑडिट की कमी और ठेकेदारी प्रथा ने इस पोषण अभियान को महज एक व्यावसायिक गतिविधि में बदल दिया है।

इस तरह से कारखाने में बने चावल खेतों के लिए भी चुनौती हैं। जब सरकार केवल चावल के फोर्टिफिकेशन पर अरबों रुपये खर्च करती है, तो पूरा ध्यान ’धान’ की खेती और वितरण पर केन्द्रित हो जाता है। इससे बाजरा, रागी, कोदो और ज्वार जैसे ’श्री अन्न’ (मोटे अनाज), जो प्राकृतिक रूप से पोषक तत्वों से भरपूर हैं, हाशिये पर चले जाते हैं।

भारत में चावल की हजारों देशी किस्में (जैसे काला नमक, लाल चावल, जोहा आदि) उपलब्ध हैं, जिनमें स्वाभाविक रूप से जिंक और आयरन होता है। कृत्रिम संवर्धन की नीति इन प्राकृतिक रूप से समृद्ध किस्मों के संरक्षण के बजाय मशीनी चावल को प्राथमिकता दे रही है।

फोर्टिफाइड चावल को कुपोषण का अंतिम सत्य मान लेना एक बड़ी भूल थी। यह एक ’आपातकालीन हस्तक्षेप’ तो हो सकता है, लेकिन यह कभी भी ’संपूर्ण पोषण’ का विकल्प नहीं बन सकता। सरकार को कई वर्षों बाद यह बात समझ में आ गई और शुक्र है कि उसने 27 फरवरी से ‘फोर्टिफाइड ’ चावल के वितरण पर रोक लगा दी है।

वैसे, सरकार को उन क्षेत्रों में गैर-संवर्धित सामान्य चावल का विकल्प भी खुला रखना चाहिए जहां आनुवंशिक बीमारियों का प्रसार अधिक है। हमें तकनीक से अधिक अपनी मिट्टी की विविधता और जैव-विविधता पर भरोसा करना होगा।

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