आईटी शहरों का विस्तार और भारत का बढ़ता जल संकट
आईटी शहरों का विस्तार और भारत का बढ़ता जल संकट

आईटी शहरों का विस्तार और भारत का बढ़ता जल संकट

शहरों में झीलों और तालाबों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना

अजय सहाय

2003 के बाद भारत में आईटी आधारित शहरीकरण की तेज़ लहर ने देश के कई शहरों—जैसे नोएडा, बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई और गुरुग्राम—को वैश्विक आईटी हब में बदल दिया, और इसी दौर को कई जल-विशेषज्ञ भारत के शहरी जल संकट की शुरुआत का महत्वपूर्ण चरण मानते हैं, क्योंकि इन शहरों का विकास प्राकृतिक जल संतुलन की वैज्ञानिक योजना के बिना हुआ।

केंद्रीय जल आयोग (CWC), केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB), नीति आयोग की “Composite Water Management Index-2018” और विश्व बैंक की रिपोर्टों के अनुसार भारत में 2000 के बाद शहरी आबादी में तीव्र वृद्धि हुई—2001 में जहाँ भारत की शहरी आबादी लगभग 28% थी, वहीं 2023 तक यह 36% से अधिक हो गई और 2035 तक इसके 40% से ऊपर पहुँचने का अनुमान है।

इसी समय आईटी सेक्टर के विस्तार ने लाखों रोजगार पैदा किए, जिससे नोएडा, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों की जनसंख्या विस्फोटक रूप से बढ़ी। उदाहरण के लिए बेंगलुरु की जनसंख्या 2001 में लगभग 56 लाख थी जो 2023 तक 1.3 करोड़ से अधिक हो गई, जबकि शहर की जल संरचना उसी अनुपात में विकसित नहीं हुई।

वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार 1960 के दशक में बेंगलुरु में लगभग 260 झीलें और जलाशय थे जो वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज का मुख्य आधार थे, लेकिन शहरीकरण और आईटी पार्कों के निर्माण के कारण 2020 तक इनकी संख्या घटकर लगभग 80–90 के आसपास रह गई और कई झीलें अतिक्रमण, कंक्रीट निर्माण तथा सीवेज प्रदूषण के कारण नष्ट हो गईं।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और IISc बेंगलुरु के अध्ययन बताते हैं कि 1973 से 2017 के बीच बेंगलुरु का निर्मित क्षेत्र (built-up area) 8% से बढ़कर 77% हो गया, जबकि जलस्रोतों का क्षेत्र 3.4% से घटकर लगभग 0.9% रह गया, जिसके कारण वर्षा जल का प्राकृतिक अवशोषण कम हुआ और भूजल स्तर लगातार नीचे जाता गया।

इसी प्रकार नोएडा और गुरुग्राम जैसे आईटी-कॉरिडोर वाले क्षेत्रों में 2000 के बाद तेजी से ऊँची इमारतें, आईटी पार्क और कंक्रीट सड़कें बनीं, जिससे वर्षा जल का 70–80% हिस्सा सीधे ड्रेनेज में बहकर यमुना या अन्य नदियों में चला जाता है और भूजल रिचार्ज कम होता है। केंद्रीय भूजल बोर्ड के अनुसार दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में 2000 के बाद भूजल दोहन recharge से लगभग 1.5–2 गुना अधिक हो गया, जिसके कारण कई इलाकों में भूजल स्तर प्रति वर्ष 0.5 से 1 मीटर तक गिरने लगा।

बेंगलुरु में स्थिति और गंभीर हो गई, जहाँ पहले 50–60 फीट की गहराई पर पानी मिल जाता था, वहीं अब कई स्थानों पर 800–1200 फीट तक बोरिंग करनी पड़ रही है। नीति आयोग की 2018 की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 21 बड़े शहर—जिनमें बेंगलुरु, दिल्ली, हैदराबाद और चेन्नई शामिल हैं—भूजल समाप्ति के गंभीर खतरे का सामना कर रहे हैं और लगभग 10 करोड़ से अधिक लोगों पर इसका प्रभाव पड़ सकता है।

चेन्नई का 2019 का “Day Zero” संकट इसका बड़ा उदाहरण है, जब चार प्रमुख जलाशयों का जल लगभग समाप्त हो गया और शहर को टैंकरों और ट्रेन से पानी लाना पड़ा। विशेषज्ञ बताते हैं कि आईटी हब बनने के साथ-साथ जल की मांग तेजी से बढ़ी—एक बड़े आईटी पार्क में प्रतिदिन लाखों लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जिसमें पीने का पानी, कूलिंग सिस्टम, कैंटीन, साफ-सफाई और लैंडस्केपिंग शामिल हैं।

अनुमान है कि बेंगलुरु का कुल जल उपयोग प्रतिदिन लगभग 2,000–2,500 मिलियन लीटर है, जबकि कावेरी नदी से मिलने वाला पानी लगभग 1,450 मिलियन लीटर प्रतिदिन है, जिससे बाकी जरूरतें भूजल और टैंकरों से पूरी की जाती हैं। इसी कारण बेंगलुरु में प्रतिदिन 3,000–4,000 से अधिक टैंकर पानी सप्लाई करते हैं। वैज्ञानिक रूप से देखा जाए तो समस्या केवल जनसंख्या वृद्धि नहीं बल्कि जल चक्र (Hydrological Cycle) के टूटने से जुड़ी है। जब किसी शहर में प्राकृतिक मिट्टी और हरित क्षेत्र की जगह कंक्रीट और डामर ले लेते हैं तो वर्षा जल का 50–70% हिस्सा जमीन में रिसने के बजाय सीधे बह जाता है।

IISc के अध्ययन बताते हैं कि यदि शहरों में 30% हरित क्षेत्र और जलस्रोत बने रहें तो वर्षा जल का बड़ा हिस्सा भूजल में समा सकता है और जल संकट कम हो सकता है। भारत में औसतन 1100 मिमी वर्षा होती है, जो कुल मिलाकर लगभग 4000 BCM (अरब घन मीटर) जल के बराबर है, लेकिन शहरीकरण के कारण इस विशाल वर्षा जल का बहुत बड़ा हिस्सा संग्रहित नहीं हो पाता।

आईटी हब शहरों में वर्षा जल संचयन की कमी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया। उदाहरण के लिए यदि किसी 1000 वर्गमीटर छत पर 1000 मिमी वर्षा होती है तो लगभग 10 लाख लीटर पानी संग्रहित किया जा सकता है, लेकिन अधिकांश भवनों में यह व्यवस्था नहीं है। इसी कारण भारत सरकार और कई राज्य सरकारों ने वर्षा जल संचयन को अनिवार्य करने की नीति बनाई, जैसे कर्नाटक में 2009 से रेन वाटर हार्वेस्टिंग नियम लागू किए गए। इसके बावजूद क्रियान्वयन कमजोर रहने से समस्या बनी रही।

शहरी जल संकट का एक अन्य कारण जलस्रोतों का अतिक्रमण है। बेंगलुरु, हैदराबाद और नोएडा में कई झीलें और नाले आईटी पार्कों और आवासीय कॉलोनियों में बदल दिए गए, जिससे प्राकृतिक जल निकासी तंत्र बाधित हुआ और कई शहरों में बाढ़ और जल संकट दोनों समस्याएँ एक साथ उत्पन्न हो गईं। विशेषज्ञ इसे “Urban Flood-Drought Paradox” कहते हैं—यानी बारिश के समय शहर डूब जाते हैं और गर्मियों में पानी की कमी हो जाती है।

विश्व बैंक और UN-Water के अनुसार भारत के शहरों में लगभग 40% पेयजल वितरण पाइपलाइन लीकेज और गैर-राजस्व जल (Non-Revenue Water) के कारण नष्ट हो जाता है, जिससे जल संकट और बढ़ जाता है। यदि इस लीकेज को नियंत्रित कर लिया जाए तो लाखों लोगों की पानी की जरूरत पूरी की जा सकती है। इसलिए यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि जल संकट केवल 2003 में आईटी हब बनने से शुरू हुआ, लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि उसी दौर में तेज़ शहरीकरण, भूजल का अत्यधिक दोहन, झीलों और तालाबों का विनाश और कंक्रीट आधारित विकास मॉडल ने जल संकट को तेज़ कर दिया।

वैज्ञानिक समाधान भी इसी दिशा में हैं—शहरों में झीलों और तालाबों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना, अपशिष्ट जल का पुनर्चक्रण, हरित क्षेत्र बढ़ाना और जल बजटिंग को लागू करना। कई शहर अब इस दिशा में कदम उठा रहे हैं—बेंगलुरु में झील पुनर्जीवन परियोजनाएँ, हैदराबाद में मिशन काकतीय, और बिहार में जल-जीवन-हरियाली जैसे कार्यक्रम वर्षा जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा दे रहे हैं।

जल विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शहर अपने वर्षा जल का केवल 25–30% भी स्थानीय स्तर पर संग्रहित कर लें तो शहरी जल संकट का बड़ा हिस्सा कम किया जा सकता है। इसलिए आईटी आधारित विकास और जल प्रबंधन को साथ-साथ चलाना भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है, ताकि आर्थिक प्रगति के साथ जल सुरक्षा और जलवायु सहनशीलता (Climate Resilience) भी सुनिश्चित हो सके।