Rohit Kaushik

करोड़ों रुपये खर्च, फिर भी कराह रही यमुना

     यमुना को अनेक शहर प्रदूषित कर रहे हैं लेकिन यमुना को प्रदूषित करने में दिल्ली का बड़ा योगदान है। एक अध्ययन में पता चला है कि यमुना की कुल प्रदूषण क्षमता में दिल्ली का योगदान 76 प्रतिशत है, जबकि इसकी लंबाई में दिल्ली की हिस्सेदारी मात्र 2 प्रतिशत है। दिल्ली में यमुना 52 किलोमीटर तक बहती है, जिसमें से 22 किलोमीटर का महत्वपूर्ण हिस्सा वजीराबाद से ओखला के बीच शहरी दिल्ली से होकर गुजरता है। दिल्ली के कुछ हिस्सों में पानी में फीकल कॉलिफॉर्म (मानव और पशुओं के मल से आने वाले बैक्टीरिया) का स्तर निर्धारित सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक दर्ज किया गया है। इसके साथ ही डिटर्जेंट और औद्योगिक कचरे के कारण नदी के पानी पर कभी-कभी जहरीले झाग की मोटी परत भी तैरती रहती है। सरकारी स्तर पर यमुना के प्रदूषण को रोकने के लिए काम हो तो रहा है लेकिन सरकारी प्रयास नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं। इस संबंध में कई परियोजनाओं को मंजूरी भी दी जा रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पूर्ण क्षमता के साथ काम नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल जब जनता की लापरवाही और सरकारी नीतियों के सही ढंग से क्रियान्वयन न होने के कारण यमुना का प्रदूषण नहीं रुक पाता है तो चिंता होना स्वाभाविक है।

     हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं ने दिल्ली-हरियाणा के यमुना क्षेत्रों में मछलियों की जांच की। इस दौरान मछलियों के जितने भी सैंपल लिए गए, उन सभी में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी की पुष्टि हुई। दिल्ली के सूर घाट और सोनिया विहार में यमुना की मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा हरियाणा के यमुनानगर और करनाल की तुलना में काफी ज्यादा मिली। यही कारण है कि शोधकर्ताओं ने दिल्ली के यमुना क्षेत्र को माइक्रोप्लास्टिक के उच्च प्रदूषण वाले क्षेत्र के रूप दर्ज किया। इसके लिए शहर से नदी में बिना उपचार के पहुंचने वाला सीवेज और खुले में पड़ा प्लास्टिक प्रमुख कारण माने गए। इस अध्ययन में यह बात भी सामने आई कि मछलियों में मिले माइक्रोप्लास्टिक में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी फाइबर यानी प्लास्टिक के महीन रेशों की थी। ये रेशे सिंथेटिक कपड़ों की धुलाई, घरेलू नालियों, कपड़ा उद्योगों और सीवेज के माध्यम से नदी में पहुंच सकते हैं। इसके बाद यही महीन रेशे पानी में तैरते हुए मछलियों के शरीर में दाखिल हो जाते हैं। बहरहाल यमुना की सफाई पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं लेकिन यमुना को प्रदूषण से मुक्त नहीं किया जा सका।

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