पंकज चतुर्वेदी
देश के ताप बिजली घरों में एक पुरानी लेकिन लगातार गहराती समस्या फिर सुर्खियों में है — बॉयलर में जितना कोयला झोंका जाता है, उसके अनुपात में उतनी बिजली नहीं बन पा रही, जबकि चिमनी और राख तालाबों में जमा होने वाली राख की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। यह समस्या केवल आर्थिक या तकनीकी नहीं, बल्कि गहरे पर्यावरणीय कारणों से जुड़ी है, जिन्हें समझना ज़रूरी है।
तेलंगाना इस संकट का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। राज्य ऊर्जा विभाग के अनुसार सिंगरेनी कोलियरीज़ से मिल रहे घटिया कोयले के कारण पिछले 27 महीनों में करीब 9,593 मिलियन यूनिट बिजली उत्पादन का नुकसान हुआ और राज्य को लगभग 2,900 करोड़ रुपये की आर्थिक क्षति उठानी पड़ी। तेलंगाना जेनको ने सिंगरेनी को लिखे एक पत्र में बताया कि आपूर्ति किए जा रहे निम्न ग्रेड कोयले का वास्तविक कैलोरी मान महज़ 2,800 से 3,400 किलोकैलोरी प्रति किलोग्राम है, जबकि संयंत्रों की डिज़ाइन आवश्यकता 4,375 किलोकैलोरी प्रति किलोग्राम है। स्थिति की गंभीरता इसी से समझी जा सकती है कि सितंबर में जेनको को कुल कोयले का केवल 26 प्रतिशत ही उच्च ग्रेड में मिला, और अक्टूबर के मध्य तक यह हिस्सा घटकर मात्र 13 प्रतिशत रह गया। इसके चलते हीट रेट और सहायक ऊर्जा खपत बढ़ी, संयंत्रों को आंशिक भार पर चलाना पड़ा, राज्य विद्युत नियामक आयोग के मानकों का पालन प्रभावित हुआ, और राख निपटान प्रणाली पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ा।
मध्य प्रदेश में भी यही रुझान स्पष्ट दिखता है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार 31 अगस्त 2026 तक राज्य के 14 ताप बिजलीघरों में कुल 67.87 लाख टन कोयला भंडार पर्याप्त मात्रा में मौजूद था, फिर भी अप्रैल से जून 2026 के बीच कोयले का सकल ऊष्मीय मान लगातार घटता गया। खंडवा के श्री सिंगाजी ताप बिजलीघर की दूसरी चरण इकाइयों में तीन महीनों में ऊष्मीय मान 3,659 से घटकर 3,367 किलोकैलोरी प्रति किलोग्राम रह गया, यानी 292 किलोकैलोरी की गिरावट, और पहली चरण की इकाइयों में भी यह मान अप्रैल के 3,678 से घटकर जून में 3,443 किलोकैलोरी रह गया। सतपुड़ा और अमरकंटक विस्तार की नई इकाइयों में भी क्रमशः 3,869 से 3,725 तथा 4,010 से 3,973 किलोकैलोरी तक की गिरावट दर्ज हुई। यानी कोयले का भंडार पर्याप्त होने के बावजूद उसकी गुणवत्ता में यह निरंतर गिरावट उत्पादन दक्षता के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।
भारत में इस्तेमाल होने वाला अधिकांश कोयला “गैर-कोकिंग” श्रेणी का है, जो बॉयलर चलाने के लिए इस्तेमाल होता है, और इसकी सबसे बड़ी समस्या इसमें मौजूद राख की ऊंची मात्रा है। जहां आयातित, यानी इंडोनेशियाई या दक्षिण अफ्रीकी कोयले में राख की मात्रा सामान्यतः 10 से 15 प्रतिशत के आसपास रहती है, वहीं घरेलू भारतीय कोयले में यह 30 से 45 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। इसके साथ ही भारतीय कोयले का कैलोरी मान भी अपेक्षाकृत कम, आमतौर पर 3,000 से 4,000 किलोकैलोरी प्रति किलोग्राम के दायरे में रहता है, जबकि अच्छी गुणवत्ता के आयातित कोयले का कैलोरी मान 5,500 से 6,000 किलोकैलोरी प्रति किलोग्राम तक होता है।
आखिर भारतीय कोयला इतना घटिया क्यों है? इसका जवाब मुख्यतः प्रकृति और भूविज्ञान में छिपा है। भारत का अधिकांश कोयला, करीब 90 प्रतिशत, लगभग 25 करोड़ वर्ष पुरानी गोंडवाना चट्टानों से प्राप्त होता है। यह कोयला “ड्रिफ्ट-मूल” प्रकार का है, यानी वनस्पति अवशेष नदी-प्रवाह के साथ बहकर जमा हुए, जिसके साथ रेत, मिट्टी और अन्य खनिज कण भी मिश्रित हो गए। इसके विपरीत, इंडोनेशिया और अमेरिका जैसे देशों का अधिकांश कोयला “इन-सीटू” प्रकार का है, जो वहीं जमा हुआ जहां वनस्पति उगी थी, इसलिए उसमें राख स्वाभाविक रूप से कम होती है। इसके अलावा भारतीय कोयला भंडार अपेक्षाकृत उथली गहराई पर, पतली और अनियमित परतों में स्थित हैं, और खुली खदान खनन के दौरान इन परतों के साथ ऊपर-नीचे की मिट्टी और शेल की परतें भी अनिवार्य रूप से मिश्रित हो जाती हैं। देश में उत्खनित कुल कोयले का बड़ा हिस्सा बिना धुलाई के सीधे बिजली घरों को भेज दिया जाता है, क्योंकि वाशरी क्षमता मांग से काफी कम है, और इसके साथ ही उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु के कारण भंडारण के दौरान कोयले में नमी भी बढ़ जाती है, जिससे उसका प्रभावी कैलोरी मान और घट जाता है।
जब बॉयलर में अधिक राख और कम कैलोरी मान वाला कोयला डाला जाता है, तो दहन की दक्षता घट जाती है, और संयंत्र को समान मात्रा में बिजली बनाने के लिए कहीं अधिक कोयला जलाना पड़ता है — विशेषज्ञों के अनुमान के अनुसार यह खपत सामान्य से 15 से 20 प्रतिशत तक अधिक हो सकती है। बॉयलर ट्यूबों में राख की परत जमने से ऊष्मा स्थानांतरण बाधित होता है, उपकरणों पर घर्षण बढ़ता है, और प्लांट लोड फैक्टर यानी संयंत्र की वास्तविक उत्पादन क्षमता में गिरावट आती है।
घटिया कोयले का असर केवल बिजलीघरों तक सीमित नहीं रहता, यह सीधे आम उपभोक्ता की बिजली दर पर भी पड़ता है। प्रयास एनर्जी ग्रुप के एक अध्ययन के अनुसार “बिल किए गए” और वास्तव में “जलाए गए” कोयले के कैलोरी मान में अक्सर बड़ा अंतर पाया जाता है। महाराष्ट्र राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी के कुछ मामलों में यह अंतर 1,200 किलोकैलोरी प्रति किलोग्राम तक पाया गया, जिससे कच्चे कोयले की कीमत पर करीब 61 प्रतिशत तक अतिरिक्त बोझ पड़ा, और एनटीपीसी के संयंत्रों में वित्त वर्ष 2018 से 2022 के विश्लेषण में भी लगातार करीब एक ग्रेड की गिरावट पाई गई, जिससे वित्त वर्ष 2022 में प्रति टन लगभग 69 रुपये यानी 8.34 प्रतिशत का अतिरिक्त भुगतान करना पड़ा। चूंकि ईंधन लागत सीधे उपभोक्ताओं पर डाल दी जाती है, इसलिए घटिया कोयले की पूरी आर्थिक कीमत अंततः बिजली उपभोक्ता ही चुकाता है। कोयले की गुणवत्ता मापने की प्रक्रिया को स्वचालित बनाकर तथा गणना का आधार बदलकर महाराष्ट्र के राज्य ताप बिजलीघरों की ऊर्जा लागत में लगभग 13 प्रतिशत तक की कमी लाई जा सकती है।
केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के अनुसार भारत में लगभग 71 प्रतिशत बिजली आज भी कोयला आधारित ताप संयंत्रों से बनती है, और देश के करीब 180 ताप संयंत्रों की कुल क्षमता 212 गीगावाट है। अप्रैल 2023 से 2024 के बीच बिजली उत्पादन के लिए लगभग 29.18 लाख मिलियन टन कोयला जलाया गया, जिससे लगभग 11.67 लाख टन फ्लाई ऐश और बॉटम ऐश उत्पन्न हुई, और इसमें से करीब 8.35 लाख मिलियन टन राख निचले इलाकों और राख तालाबों में डंप कर दी गई, जबकि पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा 1999 में ही राख के 100 प्रतिशत उपयोग का निर्देश जारी किया जा चुका था। मध्य प्रदेश के झाबुआ जैसे कई इलाकों में कोयले की राख सामग्री 30 से 40 प्रतिशत तक पाई गई है, जिससे बनने वाली विशाल मात्रा में राख आसपास के गांवों में स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है। सूखी राख हवा में उड़कर सूक्ष्म कणों के रूप में फैलती है, जिससे सांस संबंधी बीमारियां बढ़ती हैं, और राख तालाबों से रिसकर पारा, आर्सेनिक, सीसा व कैडमियम जैसी भारी धातुएं भूजल और कृषि भूमि में मिल जाती हैं। कम कैलोरी मान के कारण प्रति यूनिट बिजली उत्पादन में अधिक कोयला जलाना पड़ता है, जिससे प्रति मेगावाट कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ जाता है — यानी घटिया कोयला जलवायु परिवर्तन को भी अप्रत्यक्ष रूप से तेज करता है।
भारतीय कोयले की घटिया गुणवत्ता कोई अस्थायी प्रबंधकीय खामी नहीं, बल्कि उसकी भूवैज्ञानिक उत्पत्ति, खनन पद्धति और सीमित धुलाई क्षमता से जुड़ी एक संरचनात्मक समस्या है। इसका समाधान कोयला धुलाई क्षमता बढ़ाने, राख के औद्योगिक पुनर्उपयोग यानी सीमेंट, ईंट और सड़क निर्माण में इसके अनिवार्य इस्तेमाल, तथा दीर्घकाल में स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की ओर तेज़ी से बढ़ने में निहित है। जब तक ये कदम गंभीरता से नहीं उठाए जाते, तब तक अधिक कोयला, कम बिजली और ज्यादा राख का यह दुष्चक्र देश के ऊर्जा और पर्यावरण दोनों क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाता रहेगा।