रोहित कौशिक
देश की महत्वपूर्ण नदी यमुना का प्रदूषण एक बड़ी समस्या बन गया है। यमुना के प्रदूषण को लेकर समय-समय पर कई अध्ययन प्रकाशित होते रहते हैं। यमुना का प्रदूषण कम करने की सरकारी योजनाएं भी अपने तरीके से चलती ही रहती हैं। इसके बावजूद यमुना नदी का प्रदूषण कम नहीं हो रहा है। केवल सरकारी नीतियों को ही दोष क्यों दिया जाए, जनता भी यमुना का प्रदूषण रोकने के लिए गंभीर नहीं है। जनता को प्रदूषण रोकने में सहयोग देना चाहिए लेकिन जनता एक कदम आगे बढ़कर यमुना का प्रदूषण बढ़ाने में सहयोग कर रही है। इसका अर्थ यह है हम स्वयं ही नदियों के प्रदूषण को लेकर गंभीर नहीं हैं। इस मुद्दे पर सरकार से भी सवाल पूछा जाना चाहिए लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल सरकारी नीतियों के भरोसे रहने से यमुना को स्वच्छ बनाया जा सकता है। हमें कुछ सवाल स्वयं से भी पूछने चाहिएं। यमुना को स्वच्छ बनाए रखने के प्रति हम कितने गंभीर हैं ? क्या हमने यमुना का प्रदूषण कम करने के लिए कुछ प्रयास किया है ? क्या केवल भाषणबाजी से यमुना का प्रदूषण कम हो सकता है ? सरकारी नीतियों के सही ढंग से क्रियान्वयन और जनता के सच्चे प्रयासों से ही यमुना का प्रदूषण खत्म किया जा सकता है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि यमुना नदी के आस-पास मौजूद फैक्ट्रियों और उद्योगों से निकलने वाला बिना उपचारित रासायनिक कचरा सीधे नदी में बहा दिया जाता है। इस कचरे में निकल, क्रोमियम, सीसा, कैडमियम और आर्सेनिक जैसी अत्यधिक जहरीली भारी धातुएं होती हैं। इसके साथ ही अनेक जगहों पर शहरों के गंदे नालों का पानी यमुना में गिरता है। इस पानी का उपयोग जब नदी किनारे की खेती में सिंचाई के लिए किया जाता है तो ये धातुएं मिट्टी में मिल जाती हैं। जब प्रदूषित पानी से फसलों को सींचा जाता है तो मिट्टी इन भारी धातुओं को सोख लेती है। पौधे अपनी जड़ों के माध्यम से पानी और पोषक तत्वों के साथ-साथ इन जहरीले तत्वों को भी सोख लेते हैं। कुछ सब्जियां विशेष तौर पर पत्तेदार और जमीन के अंदर उगने वाली सब्जियां भारी धातुओं को बहुत तेजी से सोखती हैं। इन सब्जियों का लगातार सेवन करने से मानव शरीर में ये जहरीली धातुएं जमा होने लगती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार ये लंबे समय में कैंसर, गुर्दों और लीवर के रोग तथा तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहंुचाती हैं। हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के एक शोध में बताया गया है कि यमुना के जल से सींची गई सब्जियों में भारी धातुओं की मात्रा खतरनाक स्तर तक पाई गई। प्याज, पालक, मूली, मेथी, धनिया और सरसो समेत कई सब्जियों में निकल, क्रोमियम, जिंक, कैडमियम और सीसे जैसी धातुओं की मात्रा मानक से कई गुना ज्यादा पाई गई। इस अध्ययन में अधिक प्रदूषित इलाकों में ऐसी फसलों की खेती रोकने की सिफारिश की गई है जो भारी धातुओं को अधिक मात्रा में अवशोषित करती हैं। शोधकर्ताओं ने खेतों की मिट्टी और बाजार में पहुंचने वाली सब्जियों की नियमित जांच कराने तथा नालों के प्रदूषित पानी को नदी और खेतों तक पहुंचने से पहले उपचारित करने के नियम सख्ती से लागू करने पर जोर दिया है।
यमुना को अनेक शहर प्रदूषित कर रहे हैं लेकिन यमुना को प्रदूषित करने में दिल्ली का बड़ा योगदान है। एक अध्ययन में पता चला है कि यमुना की कुल प्रदूषण क्षमता में दिल्ली का योगदान 76 प्रतिशत है, जबकि इसकी लंबाई में दिल्ली की हिस्सेदारी मात्र 2 प्रतिशत है। दिल्ली में यमुना 52 किलोमीटर तक बहती है, जिसमें से 22 किलोमीटर का महत्वपूर्ण हिस्सा वजीराबाद से ओखला के बीच शहरी दिल्ली से होकर गुजरता है। दिल्ली के कुछ हिस्सों में पानी में फीकल कॉलिफॉर्म (मानव और पशुओं के मल से आने वाले बैक्टीरिया) का स्तर निर्धारित सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक दर्ज किया गया है। इसके साथ ही डिटर्जेंट और औद्योगिक कचरे के कारण नदी के पानी पर कभी-कभी जहरीले झाग की मोटी परत भी तैरती रहती है। सरकारी स्तर पर यमुना के प्रदूषण को रोकने के लिए काम हो तो रहा है लेकिन सरकारी प्रयास नाकाफी सिद्ध हो रहे हैं। इस संबंध में कई परियोजनाओं को मंजूरी भी दी जा रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि कई सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट पूर्ण क्षमता के साथ काम नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल जब जनता की लापरवाही और सरकारी नीतियों के सही ढंग से क्रियान्वयन न होने के कारण यमुना का प्रदूषण नहीं रुक पाता है तो चिंता होना स्वाभाविक है।
हाल ही में दिल्ली विश्वविद्यालय से जुड़े शोधकर्ताओं ने दिल्ली-हरियाणा के यमुना क्षेत्रों में मछलियों की जांच की। इस दौरान मछलियों के जितने भी सैंपल लिए गए, उन सभी में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी की पुष्टि हुई। दिल्ली के सूर घाट और सोनिया विहार में यमुना की मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा हरियाणा के यमुनानगर और करनाल की तुलना में काफी ज्यादा मिली। यही कारण है कि शोधकर्ताओं ने दिल्ली के यमुना क्षेत्र को माइक्रोप्लास्टिक के उच्च प्रदूषण वाले क्षेत्र के रूप दर्ज किया। इसके लिए शहर से नदी में बिना उपचार के पहुंचने वाला सीवेज और खुले में पड़ा प्लास्टिक प्रमुख कारण माने गए। इस अध्ययन में यह बात भी सामने आई कि मछलियों में मिले माइक्रोप्लास्टिक में सबसे ज्यादा हिस्सेदारी फाइबर यानी प्लास्टिक के महीन रेशों की थी। ये रेशे सिंथेटिक कपड़ों की धुलाई, घरेलू नालियों, कपड़ा उद्योगों और सीवेज के माध्यम से नदी में पहुंच सकते हैं। इसके बाद यही महीन रेशे पानी में तैरते हुए मछलियों के शरीर में दाखिल हो जाते हैं। बहरहाल यमुना की सफाई पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं लेकिन यमुना को प्रदूषण से मुक्त नहीं किया जा सका।
हमें यह समझना होगा कि जनसहभागिता और ठोस नीतियों के माध्यम से ही यमुना को स्वच्छ किया जा सकता है।