हर प्रखंड के लिए अलग-अलग “भूजल प्रबंधन योजना” बनाना संभव हो पाता है।
अजय सहाय
भारत में आज का जल संकट केवल सतही जल की कमी भर नहीं है, बल्कि यह एक गहरा भूजल संकट है, क्योंकि देश की कुल सिंचित भूमि का लगभग 60 प्रतिशत और ग्रामीण पेयजल का 80 प्रतिशत हिस्सा सीधे भूजल पर आधारित है, जबकि प्राकृतिक पुनर्भरण और निरंतर दोहन के बीच का अंतर बढ़ता चला जा रहा है ।
राष्ट्रीय आकलनों के अनुसार भारत में वर्ष 2024 में प्राकृतिक भूजल पुनर्भरण लगभग 447 अरब घन मीटर था, जबकि निकासी लगभग 246 अरब घन मीटर के आसपास रही—यह संतुलन अस्थिर होने का साफ संकेत है, क्योंकि देश के हजारों प्रखंडों में से लगभग 11 प्रतिशत अत्यधिक दोहन की श्रेणी में पहुंच चुके हैं और कई राज्यों में भूजल स्तर हर वर्ष औसतन 40–120 सेंटीमीटर तक गिर रहा है।
इस वैज्ञानिक और सामाजिक संकट के बीच भूजल तकनीकों—जैसे भूजल-जलवाही परत मानचित्रण, नियोजित भूजल पुनर्भरण, पुनर्भरण कुण्ड, इंजेक्शन कूप, पुनर्भरण नाली, भूजल भंडारण एवं पुनर्प्राप्ति प्रणाली तथा डिजिटल भूजल निगरानी—की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि ये न केवल भूजल को समझने का आधार देती हैं, बल्कि पुनर्जीवन, संरक्षण और समुदाय-आधारित प्रबंधन का सबसे विश्वसनीय वैज्ञानिक मार्ग प्रदान करती हैं।
इनमें सबसे पहली और सबसे आधारभूत तकनीक है भूजल-जलवाही परत मानचित्रण, जिसे केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर लगभग 25 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में पूरा किया गया है। यह मानचित्रण मिट्टी, चट्टानों, चीर-फाड़ वाले क्षेत्र, जलवाही परतों की मोटाई, भंडारण क्षमता, पुनर्भरण की संभावना, भूजल की गुणवत्ता और फॉल्ट या दरार क्षेत्रों की पहचान करता है।
यह काम किसी एक्स-रे की तरह जमीन के भीतर छिपे जल भंडार को प्रकट करता है, जिससे हर प्रखंड के लिए अलग-अलग “भूजल प्रबंधन योजना” बनाना संभव हो पाता है। इस वैज्ञानिक प्रक्रिया से यह स्पष्ट हो जाता है कि किस गाँव में पुनर्भरण नाली उपयोगी होगी, कहाँ पुनर्भरण कुण्ड लगाए जाने चाहिए, किस क्षेत्र में इंजेक्शन कूप अपनाया जा सकता है, कहाँ जलवाही परत गहरी है और कहाँ उथली, किस दिशा में दरारें हैं और किस क्षेत्र में पानी का प्रवाह स्वाभाविक रूप से अधिक है।
उदाहरण के लिए झारखंड के खूंटी जिले के उलिहातु गाँव में भूजल मानचित्रण और पुनर्भरण कुण्ड के प्रयोग से वर्षों से सूखे पड़े नलकूप पुनर्जीवित हो गए—यह दिखाता है कि सही वैज्ञानिक जानकारी के साथ छोटे हस्तक्षेप भी पूरे गाँव की जल स्थिति बदल सकते हैं।
दूसरी अत्यंत महत्वपूर्ण तकनीक है नियोजित भूजल पुनर्भरण (प्रबंधित पुनर्भरण), जिसे भारत की जल नीति में “सबसे टिकाऊ पूरक जल-स्रोत” माना गया है। इस तकनीक के माध्यम से वर्षा जल, नदियों का अतिरिक्त बहाव, सिंचाई नहरों का रिसाव, तथा शुद्ध अपशिष्टजल को योजनाबद्ध तरीके से जलवाही परतों में भेजा जाता है।
इसके लिए जलभण्डार तालाब, सूक्ष्म बाँध (चेक डैम), पुनर्भरण कुण्ड, पुनर्भरण नालियाँ, खेत तालाब और जल छन्नी मार्ग जैसे ढाँचे उपयोग में आते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि यदि इन संरचनाओं का निर्माण भूजल मानचित्रण के आधार पर किया जाए, तो ये स्थानीय भूजल में 10–20 प्रतिशत तक अतिरिक्त जल जोड़ सकती हैं, और कई स्थानों पर सूखे हैंडपंपों को पुनर्जीवित भी कर सकती हैं।
गुजरात के कई जिलों में हजारों पुनर्भरण ढाँचे बनाकर कृषि उत्पादन, भूजल भंडारण और सूखा-सहनशीलता में बड़ा सुधार हुआ है। इस तरह पुनर्भरण कोई वैकल्पिक उपाय नहीं, बल्कि 21वीं सदी की जल विज्ञान आधारित मूलभूत रणनीति है।
पुनर्भरण कुण्ड (रिचार्ज शाफ़्ट) वहाँ अत्यधिक प्रभावी है जहाँ सतह के नीचे दरारयुक्त कठोर चट्टान या बालू-कंकड़ मिश्रित जलवाही परत मौजूद हो। इस तकनीक में 20–30 मीटर गहरी कुण्ड बनाई जाती है, जिसमें ऊपर से छतों, सड़कों, स्कूलों, पार्कों या सार्वजनिक भवनों से आने वाला साफ़ वर्षाजल सीधे नीचे भेजा जाता है।
इससे दो फायदे मिलते हैं—पहला, शहरी क्षेत्रों में जलभराव कम होता है क्योंकि पानी नालियों में जाकर बाढ़ नहीं बनाता; दूसरा, भूजल स्तर स्थिर और मजबूत रहता है। यही कारण है कि कई राज्यों ने नए सरकारी भवनों में पुनर्भरण कुण्ड अनिवार्य कर दिए हैं।
इंजेक्शन कूप पुनर्भरण कुण्ड का उन्नत वैज्ञानिक रूप है, जिसमें जल को पम्प द्वारा दबावयुक्त रूप से गहरी जलवाही परतों तक भेजा जाता है। यह तकनीक उन क्षेत्रों में उपयोगी है जहाँ भूजल की कमी बहुत तीव्र है और प्राकृतिक पुनर्भरण पर्याप्त नहीं हो पाता। इसमें बाढ़ का अतिरिक्त जल, नहरों का बहाव या शुद्ध अपशिष्टजल उपयुक्त फ़िल्टरिंग के बाद जलवाही परत में भेजा जाता है।
लेकिन इसकी सबसे बड़ी शर्त यह है कि इंजेक्ट किए जाने वाले जल की गुणवत्ता अत्यंत शुद्ध हो, ताकि नाइट्रेट, फ्लोराइड, भारी धातु या जीवाणु प्रदूषण का खतरा न बढ़े। इसलिए इंजेक्शन कूप के साथ-साथ नियमित जल परीक्षण, जैविक प्रदूषण की जाँच और जल की रासायनिक गुणवत्ता की निगरानी वैज्ञानिक दृष्टि से अनिवार्य है।
भूजल पुनर्भरण की तीसरी सरल लेकिन अत्यंत व्यापक तकनीक है पुनर्भरण नाली, जो ग्रामीण भारत के लिए सबसे उपयुक्त है। 1–2 मीटर चौड़ी और 1.5–3 मीटर गहरी लंबी नाली जिसमें मोटा रेत, कंकड़ और बोल्डर भरे जाते हैं—बारिश के दौरान सतह पर बहने वाला जल इस नाली में आकर धीरे-धीरे छनकर भूजल में उतरता है।
इसी प्रकार की नालियाँ खेत की मेड़, पंचायत भवन, विद्यालय परिसर, अस्पताल और गाँव की गलियों में बनाई जा सकती हैं। भारत सरकार के नवीन आंकड़ों के अनुसार तालाब, चेक डैम, नालियों और पुनर्भरण संरचनाओं से देश में 2017 की तुलना में लगभग 11 अरब घन मीटर अतिरिक्त पुनर्भरण हुआ है, जो दर्शाता है कि ये संरचनाएँ राष्ट्रीय भूजल संतुलन को मजबूती से सुधार रही हैं।
इन सबके साथ एक अत्यंत उन्नत तकनीक है भूजल भंडारण एवं पुनर्प्राप्ति प्रणाली, जिसे ए.एस.आर. कहा जाता है। यह तकनीक विशेष रूप से उन क्षेत्रों में उपयोगी है जहाँ बरसात के समय जल की बहुतायत होती है लेकिन बाकी महीनों में सूखे की स्थिति रहती है। इसमें बरसात के दौरान अतिरिक्त जल को कूपों के माध्यम से जलवाही परतों में भेज दिया जाता है और सूखे मौसम में उसी कूप से पानी वापस निकाला जाता है।
यह प्रणाली एक “भूजल बैंक” की तरह कार्य करती है। दक्षिण बिहार, पूर्वी भारत, पश्चिम भारत और गंगा मैदानी क्षेत्रों में किए गए अध्ययनों से यह सिद्ध हुआ है कि यदि जलवाही परत की वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध हो तो ए.एस.आर. ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल संकट का स्थायी समाधान बन सकता है।
इन सभी तकनीकों की सफलता आज के युग में डिजिटल भूजल निगरानी पर निर्भर करती है। देश में लाखों गाँवों में सेंसर आधारित उपकरण लगाए जा रहे हैं, जो नलकूपों और पाइपों में जाकर भूजल स्तर, बहाव, जल गुणवत्ता और पम्पिंग मात्रा का वास्तविक-समय डेटा भेजते हैं।
इससे यह तुरंत ज्ञात हो जाता है कि किस क्षेत्र में भूजल स्तर गिर रहा है, कौन-सी पुनर्भरण संरचना सबसे प्रभावी है, किन स्थानों पर कृषि पैटर्न बदलने की आवश्यकता है और कहाँ दोहन कम करना अनिवार्य है। डिजिटल निगरानी के बिना 2047 जल आत्मनिर्भर भारत की कल्पना अधूरी रहेगी।
इन वैज्ञानिक तकनीकों के साथ सबसे महत्वपूर्ण घटक है—जनभागीदारी। भारत सरकार की अटल भूजल योजना का मूल सिद्धांत ही यह है कि जल संरचनाओं का निर्माण जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उनका जिम्मेदार उपयोग, सामुदायिक प्रबंधन, पंचायत-स्तरीय जल बजट, फसल-पानी समन्वय, जल सुरक्षा योजना और वर्षाजल संचयन में ग्रामीण जनता की सक्रिय भागीदारी।
इस योजना के अंतर्गत हजारों ग्राम पंचायतों ने अपने-अपने भूजल स्तर का नक्शा बनाया, वर्षा आधारित जल बजट तैयार किया और पुनर्भरण संरचनाओं के रखरखाव का कार्य स्वयं किया—जिसका सीधा परिणाम यह हुआ कि कई जिलों में भूजल स्तर में सेंटीमीटर से लेकर मीटर तक सुधार दर्ज किया गया।
यदि भारत को 2047 तक जल आत्मनिर्भर बनाना है तो इन तकनीकों का एक व्यापक एकीकृत ढाँचा तैयार करना होगा—जिसमें हर ग्राम पंचायत में भूजल-जलवाही परत का मानचित्र, वर्षा आधारित पुनर्भरण संरचना, खेत तालाब, सूक्ष्म बाँध, पुनर्भरण नाली, शहरी पुनर्भरण कुण्ड, अनुप्रवाह नियंत्रित ढाँचे, वेटलैंड पुनर्जीवन, पौधारोपण, डिजिटल निगरानी और सामुदायिक शिक्षा—सबको एक साथ लागू करना होगा। यदि देश के 6,50,000 गाँवों में से केवल 30 प्रतिशत गाँव भी इन तकनीकों को पूरी क्षमता से अपनाएँ, तो भूजल पुनर्भरण में विशाल वृद्धि होगी और दोहन स्वाभाविक रूप से कम हो जाएगा।
अंततः भूजल तकनीकों की यह पूरी श्रृंखला—भूजल मानचित्रण, नियोजित पुनर्भरण, पुनर्भरण कुण्ड, इंजेक्शन कूप, पुनर्भरण नाली, ए.एस.आर., डिजिटल निगरानी और जनभागीदारी—एक समग्र जल विज्ञान आधारित ढाँचा बनाती है जो भारत को जल संकट से निकालकर जल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में आगे बढ़ाती है।
यदि स्कूलों में भूजल विज्ञान शिक्षा दी जाए, युवाओं को जल प्रहरी बनाया जाए, पंचायतें नियमित जल बजट तैयार करें, पुनर्भरण संरचनाओं का रखरखाव सामूहिक रूप से किया जाए और शहरी–ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में भूजल का दोहन वैज्ञानिक आधार पर नियंत्रित किया जाए, तो भारत आने वाले वर्षों में दुनिया का पहला ऐसा बड़ा देश बन सकता है जिसने वैज्ञानिक भूजल प्रबंधन और सामाजिक सहभागिता के माध्यम से अपनी जल सुरक्षा सुनिश्चित की हो—ठीक उसी रूप में जैसा 2047 का जल आत्मनिर्भर भारत का सपना है।