जिसमें पर्व है , वही पर्वत है – राहुल सांकृत्यायन
पंकज चतुर्वेदी
अरावली पर अदालत ने भी चिंता की और समाज ने भी, शायद इस लिए कि इसके चलते देश की राजधानी पर संकट था । लेकिन देश के पर्यावरण और अस्तित्व के लिए लगभग उतनी ही महत्वपूर्ण विंध्य पर्वत श्रंखला के प्रति लापरवाही , जलवायु परिवर्तन के दौर में किसी बड़ी त्रासदी का आमंत्रण है। विंध्य पर्वत माला भारत के बीचों बीच गोलाकार पर्वत श्रृंखला है, जो उत्तर और दक्षिण भारत को पारंपरिक रूप से विभाजित करती है ।
यह नर्मदा घाटी के उत्तर तथा गंगा मैदान के दक्षिण में फैली 1,050-1,200 किमी लंबी श्रृंखला मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात और बिहार राज्यों को जोड़ती है और यह चंबल, बेतवा, केन, सोन जैसी प्रमुख नदियों का उद्गम स्थल है। सतपुड़ा से मैकल पर्वत के माध्यम से जुड़ी रहती है।
औसत ऊंचाई 600-900 मीटर वाली टूटी-फूटी पहाड़ियां जलवायु नियंत्रण और जैव विविधता के लिए आवश्यक हैं। विंध्य क्षेत्र में अवैध खनन से भूस्खलन, मिट्टी कटाव और भूजल क्षय का खतरा बढ़ा है।
वनों की कटाई, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से जैव विविधता ह्रास हो रहा है, साथ ही बाढ़ व सूखे की संभावना बढ़ गई है। इलाके में मानव बस्तियों के विस्तार से भूकंपीय जोखिम भी है। कोई 1200 किलोमीटर लंबी पर्वतमाला की सुध लेने वाला कोई नहीं हैं ।
बीते 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह अपने ही 20 नवंबर की आदेश पर रोक लगाते हुए अरावली पर्वत की ऊंचाई 100 मीटर होने पर ही पहाड़ मानने और दो पहाड़ों के बीच की दूरी 500 मीटर से अधिक होने पर उसे पहाड़ की श्रंखला न मानने के आदेश पर 21 जनवरी 2026 तक रोक लगाई, यह महज चार राज्यों में फैली अरावली का ही सवाल नहीं हैं , यह प्रायः उपेक्षित रहने वाले पूरे देश के “पहाड़ पर्यावरण “ के संरक्षण का बड़ा कदम हैं ।
अरावली पर लोगों की जागरूकता और सुप्रीम कोर्ट का निर्देश असल में बीते कुछ सालों में वायनाड़ की त्रासदी, महाराष्ट्र में हर साल ढहते पहाड़ों के नीचे दबते गाँव, उत्तराखंड से ले कर हिमाचल प्रदेश तक धँसते- उजड़ते पहाड़ों को याद दिलवाने का माध्यम है । पहाड़ केवल पर्यटन या फिर खनन नहीं हैं , बल्कि धरती के अस्तित्व का महत्वपूर्ण अंग हैं ।
अभी कुछ सौ साल पहले तक पहाड़, उस पर घने जंगल भारत के लोगों की लोक संस्कृति व सह-अस्तित्व जीवन का मूलाधार थे। ईस्ट इंडिया कपंनी तो यहां केवल पैसा कमाने आई थी और उसके लिए पेड़ ‘हरा सोना’ और पहाड़ महज खनिज का स्त्रोत थे। कंपनी ने पहाड़ उजाड़ने की जो शुरूआत की, वह आज तक थम नहीं रही है।
प्रकृति में जिस पहाड़ के निर्माण में हजारों-हजार साल लगते हैं, हमारा समाज उसे उन निर्माणों की सामग्री जुटाने के नाम पर तोड़ देता है जो कि बामुश्किल सौ साल चलते हैं। पहाड़ केवल पत्थर के ढेर नहीं होते , वे इलाके के जंगल, जल और वायु की दशा और दिशा तय करने के साध्य होते हैं। जहां सरकार पहाड़ के प्रति बेपरवाह है तो पहाड़ की नाराजी भी समय-समय पर सामने आ रही है।
पहाड़ यानि बड़ी पर्वत मालाएं, स्थानीय छोटी पहाडियां, और पठार । पहाड़ देशभर की अधिकांश नदियों के उदगम स्थल भी है। चूंकि ये धरती से उभरी हुई आकृतियां विभिन्न खनिजों का भंडार हैं, इनमें अवस्थित पत्थर आधुनिक निर्माण कार्य की अनिवार्य सामग्री है, अतः मनुष्य ने इसका जमकर शोषण किया।
गरमी, बरसात, ठंड – सभी मौसम में पहाड ना केवल पर्यावरण को संरक्षित व संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, बल्कि हजारों किस्म की वनस्पति और जीव-जंतुओं की विलक्षण जैव विविधता का आश्रय स्थल भी होते है।
बढ़ती आबादी के लिए आवास या मूलभूत सुविधाएं जुटाने का कार्य हो या फिर पेट भरने के लिए अन्न उगाने की चुनौती, हर समय निरीह-मौन पहाडों को ही उजाड़ा जाता है। एक पहाड़ के समाप्त होने का अर्थ है कि वहां पल रही जैव विविधता श्रंखला का अंत। यदि धरती या नदी मां हैं तो जान लें कि पहाड़ पिता हैं।
देश में पर्यावरण संरक्षण के लिए जंगल, पानी बचाने की तो कई मुहिम चल रही हैं , लेकिन मानव जीवन के विकास की कहानी के आधार रहे पहाड़-पठारों के नैसर्गिक स्वरूप को उजाड़ने पर कम ही विमर्श है। समाज और सरकार के लिए पहाड़ अब जमीन या धनार्जन का माध्यम रह गए हैं और पहाड़ निराश-हताश से अपनी अंतिम सांस तक समाज को सहेजने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
हजारों-हजार साल में गांव-शहर बसने का मूल आधार वहां पानी की उपलब्धता होता था। पहले नदियों के किनारे सभ्यता आई, फिर ताल-तलैयों के तट पर बस्तियां बसने लगीं। जरा गौर से किसी भी आंचलिक गांव को देखें, जहां नदी का तट नहीं है- कुछ पहाड़, पहाड़े के निचले हिस्से में झील व उसके घेर कर बसी बस्तियों का ही भूगोल दिखेगा ।
वहां के समाज ने पहाड़ के किनारे बारिश की हर बूंद को सहेजने तथा पहाड़ पर नमी को बचा कर रखने की तकनीक सीख ली थी। हरे-भरे पहाड़, खूब घने जंगल वाले पहाड़ जिन पर जड़ी बूटियां थी, पंक्षी थे, जानवर थे। जब कभी पानी बरसता तो पानी को अपने में समेटने का काम वहां की हरियाली करती, फिर बचा पानी नीचे तालाबों में जुट जाता।
भरी गरमी में भी वहां की शाम ठंडी होती और कम बारिश होने पर भी तालाब लबालब। बीते चार दशकों में तालाबों की जो दुर्गति हुई सो हुई, पहाड़ों पर हरियाली उजाड़ कर उसके पत्थर और खनिज निकाल कर गहरी खाईयां बना दी गईं, जहां बस्ती थी वहाँ झोपड़-झुग्गी उगा दी गईं ।
नंगे पहाड़ पर पानी गिरता है तो सारी पहाडी काट देता है, जिससे नदी- तालाब उथले हो गए । किसी को जमीन चाहिए थी तो किसी को पत्थर तो किसी को खनिज; पहाड़ को एक बेकार, बेजान संरचना समझ कर खोद दिया गया। भला हो अरावली का जिसके चलते अब समझ में आ रहा है कि नष्ट किए गए पहाड़ के साथ उससे जुड़ा पूरा पर्यावरणीय तंत्र ही नष्ट हो जाता है।
जानना होगा कि भारत में कुल मिलाकर 15% या 0.49 मिलियन वर्ग किमी भूभाग भूस्खलन के प्रति संवेदनशील है । भारत में भूस्खलन से सबसे अधिक प्रभावित हिस्से हिमालय, पश्चिमी घाट, नीलगिरी और विंध्य हैं । चूँकि जहां पर्यटन, धर्म और व्यापार है , वहां अंधाधुंध निर्माण से जब पहाड़ खिसकता है तो उसकी चर्चा देर तक और दूर तक होती है , लेकिन महाराष्ट्र के ऐसे बहुत से गाँव हैं जहां पहाड़ गिर तो पूरा गाँव ही लुप्त हो गया , जहां अभी सलीके का पहुँच मार्ग नहीं है, में तबाही पर महज मुआवजा की खानापूर्ति हे पर्याप्त समझी जाती है ।
हिमालय के अलावा देश के जिन इलाकों में भूस्खलन हो रहा है, उनमें से अधिकांश सहाद्री, पश्चिमी घाट या पूर्वी घाट पर्वतमाला के करीब हैं। इन सभी स्थानों पर घटना के दौरान अचानक एक दिन में तीन से चार सौ मिलीमीटर बरसात रही हैं । इन सभी स्थानों पर पहाड़ों पर बस्ती और खेत के लिए बेशुमार पेड़ काटे गए।
जब मिटटी पर पानी की बड़ी बूंदें सीढी गिरती हैं तो, एक तो ये मिटटी को काटती हैं, दूसरा बहती मिटटी करीबी जल निधि- नदी- जोहड़- तालाब को उथला करती है. इन दोनों से पहाड़ उपर से और धरातल से कमजोर होता है। यही नहीं इन सभी क्षेत्रों में निर्माण और खनन के लिए ताकतवर विस्फोटों का इस्तेमाल लम्बे समय से हो रहा है।
पाँच साल पहले केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा तैयार पहली जलवायु परिवर्तन मूल्यांकन रिपोर्ट में स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि समुद्र और बड़ी पर्वत मालाओं के आसपास के पहाड़ी इलाके बदलते मौसम के लिए सर्वाधिक संवेदनशील हैं और यहाँ चरम मौसम की मार से प्राकृतिक आपदाओं की अधिक संभावना है। ये सभी रिपोर्ट और उसकी चेतावनियाँ विकास के नाम पर पहाड़ों के साथ की जा रही बर्बरता जारी रही।
अरावली के बहाने सारे देश के पहाड़ों के बारे में सोचने , उनके अस्तित्व की अनिवार्यता और उनके साथ हो रही निर्ममता के प्रति संवेदनशील होने का अवसर मिला हैं । जिस तरह विकास के नाम पर पेड़ों को काटने पर कानून सख्त हैं , जरूरत है कि अरावली के लिए गठित विशेषज्ञ समिति इस तरह के दिशा निर्देश तैयार अकरे, ताकि सारे देश के पहाड़ राहत महसूस कर सकें- भले ही पहाड़ों को राहत होगी लेकिन अंततः इससे लाभान्वित मनुष्य ही होगा ।
बेहतरीन लेख है।