इंदौर , फिर गांधी नगर और उसके बाद देश एक कई शहरों से सार्वजनिक जल वितरण में दूषित मिलावट की बातें सामने आ रही हैं । आखिर ऐसा होता क्यों है ?
पंकज चतुर्वेदी
इंदौर के एक मुहल्ले भागीरथपुर में लगातार हो रही मौतों की संख्या बढ़ कर 23 हो गई तो उधर गुजरात की राजधानी गांधी नगर के सेक्टर 24, 26, 28 और आदिवाड़ा क्षेत्रों में दूषित पानी पीने से कई सौ लोगों को पीलिया और टाईफाईड होने के बाद कोहराम है ।
अधिकांश बीमार बच्चे हैं और अस्पताल में हैं । इसी दौरान अब देशभर से घर में आ रहे नल के जल के असुरक्षित होने के समाचारों का अंबार है । दुर्भाग्य है कि केंद्र सरकार की 2015 में शुरू की गई अटल मिशन या अमृत-1 योजना में पाइप डालने और टंकी खड़े करने पर सन 2021 तक 72,656 करोड़ रुपये खर्च हुए और उसके बाद अमृत-2 में भी भारी भरकम व्यय हो रहा है, लेकिन तैयार संरचनाओं के रखरखाव, गुणवत्ता निर्धारण पर सभी जगह बेपरवाही देखि गई ।
केंद्र सरकार के बजट से योजनाएं तो तैयार हो गई लेकिन स्थानीय निकाय उनके निर्धारित मानक पर काम नहीं कर पा रहे । कहीं बजट नहीं है तो कहीं स्थानीय राजनीति में हाथ बंधे होते हैं और इसी कि परिणति है कि इंदौर जैसे कांड हो जाते हैं ।
ज्यादा दूर क्यों जाएँ देश की राजधानी दिल्ली में दिल्ली में अमृत 1.0 के तहत जल आपूर्ति, सीवरेज और शहरी बुनियादी ढांचे पर कुल 266 करोड़ रुपये स्वीकृत हुए। इनमें 215 करोड़ रुपये जल आपूर्ति पर खर्च हुए। इसके बावजूद दिल्ली की कोई 10 प्रतिशत आबादी के घर तक नल नहीं पहुँच पाए । काम या अनियमित वितरण , टैंकरों पर निर्भरता तो आज भी 35 प्रतिशत आबादी की स्थाई दिक्कत है ।
दिल्ली जल बोर्ड के दिसंबर 2025 के सैंपल टेस्ट में 33 नमूने फेल हुए, जिसमें भलस्वा, जनकपुरी, अशोक नगर के साथ गांधी नगर जैसे क्षेत्रों में गंदा पानी पाया गया। यमुना प्रदूषण, क्षतिग्रस्त पाइपलाइन और अनुपचारित सीवेज मिश्रण से टीडीएस, कैल्शियम व सल्फेट स्तर मानक से अधिक है।
समझना होगा कि दिल्ली में जल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा भू जल है । भलस्वा, गाजीपुर और ओखला के साथ ही बवाना में इंजीनियर सैनिटरी लैंडफिल के पास का भूजल दूषित बना हुआ है।
अतीत में झांकें तो केंद्र सरकार की कई योजनाएं, दावे और नारे फाईलों में तैरते मिलेंगे, जिनमें भारत के हर एक नागरिक को सुरक्षित पर्याप्त जल मुहैया करवाने के सपने थे। इन पर अरबों खर्च भी हुए लेकिन आज भी कोई करीब 3.77 करोड़ लोग हर साल दूषित पानी के इस्तेमाल से बीमार पड़ते हैं। लगभग 15 लाख बच्चे दस्त से अकाल मौत मरते हैं ।
अंदाजा है कि पीने के पानी के कारण बीमार होने वालों से 7.3 करोड़ कार्य-दिवस बर्बाद होते हैं। इन सबसे भारतीय अर्थव्यवस्था को हर साल करीब 39 अरब रूपए का नुकसान होता है।
नेशनल सैंपल सर्वे आफिस(एनएसएसओ) की 76वीं रिपोर्ट बताती है कि देश में 82 करोड़ लोगों को उनकी जरूरत के मुताबिक पानी मिल नहीं पा रहा है। देश के महज 21.4 फीसदी लोगों को ही घर तक सुरक्षित जल उपलब्ध है।
सबसे दुखद है कि नदी-तालाब जैसे भूतल जल का 70 प्रतिशत बुरी तरह प्रदूशित है। यह सरकार स्वीकार रही है कि 78 फीसदी ग्रामीण और 59 प्रतिषत शहरी घरों तक स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं हैं।
सारे देश के शहरी इलाकों में नल से आ रहे पानी के दूषित होने के लगभग एक जैसे कारण हैं । सबसे पहला कारण तो जल का स्रोत ही है । जिस नदी, तालाब या भूजल से पानी की आपूर्ति हो रही है , वे ही बुरी तरह बीमार हैं और उस पानी के शोधन के सयन्त्र उससे अधिक रोगग्रस्त हैं । गाँव कस्बे तक भू जल पर निर्भरता है और यह सभी जानते हैं कि गर्भ से पानी खींचना भले सरल हो लेकिन यदि वह दूषित है तो उसका निराकरण संभव नहीं ।
पहले से दूषित स्रोत से घर तक पानी के पहुँचने के रास्ते में सबसे बड़े पड़ाव ‘बड़ी पानी की टंकी’ या फिर ‘जलाशय’ खुद बीमार रहते हैं । दिल्ली में वजीराबाद और चंद्रावल जैसे जलाशयों के दशकों से सफाई नहीं हुई और उसमें कई फुट गाद है ।
किसी भी शहर -कस्बे में क्षण से खड़े ऊंचे से बड़े से टैंक में झांक कर देख लें, न जाने कितने जानवर मरे मिलेंगे, क्योंकि उनकी सफाई के लायक बजट और सफाई के दौरान वैकल्पिक पानी आपूर्ति की कोई व्यवस्था होती नहीं।
उसके बाद छोटी गलियों वाले मुहल्लों में कुछ ही फुट के दायरे में सीवर निकासी और जल आपूर्ति की पाइप लाइन का होना आम बात है । फिर वहाँ फोन-इंटरनेट प्रदाता कंपनी या फिर गैस वाली कंपनियां उसी सँकरे इलाके में खुदाई और अपनी, लाइन बिछाती रहती हैं ।
ठेकों से होने वाले इन कामों में यह कोई परवाह नहीं करता कि पानी या सीवर की सरकारी लाइन को कहीं नुकसान तो नहीं हो रहा। जब तक या तो पानी -गंदगी ऊपर बहने लगे या फिर इंदौर जैसा कांड न हो जाए, किसी को पता नहीं चलता कि कितना जहर , किस रास्ते से नलों तक आ रहा है ।
यही नहीं नलों में अनियमित पानी आने और कम दवाब से आने के निबटने के लिए सारे देश के निम्न -मध्यम ये वाले मुहल्लों में घर के बाहर अपना एक छोटा सा जल-संग्रह हौद बना लेना और मुख्य लाइन से अधिक पानी खींचने के लिए छोटा पंप लगा लेना एक आम बात है ।
एक तो इन हौद की कभी कोई सफाई नहीं होती , दूसरा यह नीचे से कब गंदे भू जल, बरसाती पानी या फिर सीवर लाइन के संपर्क में आ जाते हैं , उसका पता नहीं चलता, फिर पंप से पानी खींचने के चलते जगह-जगह पर मुख्य और सहायक आपूर्ति लाइन भी कमजोर हो कर टूटती -फूटती रहती हैं । उनके करीब ही पहले से जर्जर सीवर लाइन हैं ही और इस तरह चुपके से जल जहर बन का घरों में पहुंचता रहता है ।
पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय एजेंसी ’एकीकृत प्रबंधन सूचना प्रणाली’ (आईएमआईएस) द्वारा सन 2018 में पानी की गुणवत्ता पर करवाए गए सर्वे के मुताबिक राजस्थान में सबसे ज्यादा 19,657 बस्तियां और यहां रहने वाले 77.70 लाख लोग दूषित जल पीने से प्रभावित हैं।
आईएमआईएस के मुताबिक पूरे देश में 70,736 बस्तियां फ्लोराइड, आर्सेनिक, लौह तत्व और नाइट्रेट सहित अन्य लवण एवं भारी धातुओं के मिश्रण वाले दूषित जल से प्रभावित हैं। इस पानी की उपलब्धता के दायरे में 47.41 करोड़ आबादी आ गई है।
यह कड़वा सच है कि भारत इस समय तेजी से शहरीकरण की तरफ भाग रहा हैं और अधिकांश अनियोजित शहरीकरण । शहरी नियोजन का प्राथमिक सिद्धांत कहता है कि पीने के पानी और सीवर की लाइनें कभी भी एक-दूसरे के इतने करीब नहीं होनी चाहिए कि एक का रिसाव दूसरे को ‘ज़हर’ बना दे।
बहुत से शहरों में स्मार्ट सिटी के नाम पर भी कई करोड़ खर्च हो चुके हैं । हाल की घटनाओं ने सारे देश को चेतावनी दे दी है कि जब तक ‘जमीन के ऊपर’ की सफाई ‘जमीन के नीचे’ की सुरक्षा के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चलेगी, तब तक “स्वच्छता या स्मार्ट” के ये पदक अधूरे ही रहेंगे।