जैव विविधता, आपदा और जल आत्मनिर्भरता की चुनौती
अजय सहाय
हिमालयी क्षेत्र को विश्व की “तीसरी ध्रुवीय पट्टी” कहा जाता है क्योंकि यहाँ 9,575 से अधिक ग्लेशियर मौजूद हैं, परंतु पिछले सौ वर्षों में जलवायु परिवर्तन और तापमान वृद्धि के कारण ये ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और उनके पिघलाव से नई वेटलैंड संरचनाएँ बन रही हैं, जिनका प्रभाव न केवल हिमालयी पारिस्थितिकी पर बल्कि संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप की नदियों, जैव विविधता, आपदा जोखिम और मानव जीवन पर पड़ रहा है ।
गंगोत्री, यमुनोत्री, सियाचिन, पिंडारी और मिलम जैसे प्रमुख ग्लेशियर औसतन 15–25 मीटर प्रति वर्ष पीछे हट रहे हैं, और ISRO तथा ICIMOD के संयुक्त आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2000 से 2020 के बीच ग्लेशियर पिघलाव से बनी झीलों की संख्या 1200 से बढ़कर 2500 से अधिक हो गई, जिनका क्षेत्रफल लगभग 1400 वर्ग किलोमीटर और अनुमानित जल भंडारण 30–50 अरब घन मीटर (BCM) है।
ये झीलें और वेटलैंड्स गंगा, ब्रह्मपुत्र, यमुना और सिंधु जैसी नदियों की सहायक धाराओं को जीवन देती हैं और मानव सभ्यता की जल-सुरक्षा सुनिश्चित करती हैं। वैज्ञानिक दृष्टि से वेटलैंड्स “नेचर की किडनी” कही जाती हैं क्योंकि 1 हेक्टेयर वेटलैंड प्रति वर्ष लगभग 10 लाख लीटर जल को शुद्ध करती है, 40 लाख लीटर वर्षा जल का भंडारण करती है और लगभग 6.1 टन CO₂ अवशोषित कर जलवायु शमन में योगदान देती है।
हिमालयी वेटलैंड्स न केवल जल भंडारण और जलवायु शमन के लिए आवश्यक हैं बल्कि वे प्रवासी पक्षियों, मछलियों, स्तनधारियों और पौधों के लिए भी सुरक्षित आवास बन जाते हैं। IUCN रेड लिस्ट और BNHS की रिपोर्टों के अनुसार यहाँ लगभग 150 प्रवासी पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं—जिनमें संकटग्रस्त ब्लैक-नेक्ड क्रेन (Grus nigricollis) की वैश्विक संख्या 10,000 से कम रह गई है, जबकि साइबेरियन क्रेन (Leucogeranus leucogeranus) भारत में लगभग विलुप्त हो चुकी है।
लद्दाख के पांगोंग त्सो और त्सो मोरीरी, सिक्किम के खांगचेन्द्जोंगा बायोस्फीयर रिजर्व और उत्तराखंड की रूपकुंड झील प्रवासी पक्षियों के प्रमुख केंद्र हैं, जहाँ 30,000 से अधिक पक्षी हर वर्ष प्रजनन करते हैं। इसी प्रकार वेटलैंड्स में 250 से अधिक मछली प्रजातियाँ, 150 स्तनधारी प्रजातियाँ (जिनमें हिम तेंदुआ और कस्तूरी मृग शामिल हैं) और 3000 से अधिक पौधों की प्रजातियाँ मौजूद हैं।
किंतु जलवायु परिवर्तन की गति गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि हिमालयी क्षेत्र का औसत तापमान 0.3°C प्रति दशक बढ़ रहा है, जो वैश्विक औसत से लगभग दोगुना है, और IPCC (AR6, 2021) के अनुसार यदि यही दर जारी रही तो 2100 तक हिमालयी ग्लेशियरों का 80% हिस्सा पिघल सकता है। इससे वेटलैंड्स का विस्तार तो होगा परंतु अचानक झील फटने (GLOF) की घटनाएँ बढ़ेंगी, जिनमें 2013 की केदारनाथ आपदा—जिसमें मंदाकिनी नदी के उद्गम क्षेत्र में झील टूटने से 5700 से अधिक लोगों की मौत हुई—सबसे बड़ा उदाहरण है।
वर्तमान में हिमालयी क्षेत्र की लगभग 200 झीलें अत्यधिक संवेदनशील स्थिति में हैं। साथ ही पर्यटन का दबाव भी गंभीर समस्या है—केवल हिमाचल और उत्तराखंड में प्रति वर्ष 5 करोड़ पर्यटक आते हैं, जिनसे होटल निर्माण, वाहन उत्सर्जन और प्लास्टिक प्रदूषण झीलों व वेटलैंड्स की पारिस्थितिकी को नुकसान पहुँचा रहे हैं।
इन जटिल परिस्थितियों में संरक्षण के साथ-साथ आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों द्वारा वेटलैंड्स की लगातार निगरानी अत्यंत आवश्यक हो गई है, और यही कारण है कि उपग्रह, ड्रोन और हाइड्रोलॉजिकल मॉडल को एकीकृत कर वेटलैंड मॉनिटरिंग सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं। उदाहरण के लिए, Sentinel-1 (SAR Radar) बादल और अंधेरे में भी सतही जल-फैलाव और जलस्तर बदलाव की निगरानी करता है ।
Sentinel-2 (Optical Multispectral) वनस्पति, क्लोरोफिल, जल-गुणवत्ता और गीलापन सूचकांक (NDWI) को ट्रैक करता है; Landsat-8/9 30–100 मीटर रिज़ॉल्यूशन पर दशकों से वेटलैंड विस्तार/सिकुड़न के दीर्घकालिक ट्रेंड्स रिकॉर्ड करता है; ICESat-2 (Laser Altimeter) लेजर बीम से झीलों की सतही ऊँचाई और जलस्तर की सटीक माप करता है;
UAV-फोटोग्रामेट्री (Drone) से उच्च-रिज़ॉल्यूशन मैपिंग कर छोटे वेटलैंड्स की सीमा, वनस्पति और अवरोधों का सर्वे किया जाता है; DGPS-बाथिमेट्री झील के तल की गहराई और वॉल्यूम कैलकुलेशन कर जल भंडारण क्षमता बताती है ।
ADCP (Acoustic Doppler Current Profiler) जल प्रवाह, धाराओं और गहराई प्रोफाइल की वास्तविक-समय माप करता है; HBV Model वर्षा-पिघलन-प्रवाह संबंध समझकर वेटलैंड के जल बजट का अनुमान लगाता है; HEC-HMS हाइड्रोलॉजिकल मॉडल है जो बाढ़ और वर्षा से उत्पन्न रनऑफ को वेटलैंड तक पहुंचने का अनुमान लगाता है; और HEC-RAS हाइड्रॉलिक मॉडल है जो झील-फटाव (GLOF) या फ्लो डायनेमिक्स के दौरान डाउनस्ट्रीम प्रभावों की भविष्यवाणी करता है।
इस प्रकार, उपग्रह + ड्रोन + हाइड्रोलॉजिकल मॉडल का एकीकृत उपयोग वेटलैंड्स की सीमा, जलस्तर, गुणवत्ता और आपदा जोखिम को वैज्ञानिक रूप से ट्रैक करता है, जिससे नीति-निर्माताओं और स्थानीय समुदायों को समय रहते चेतावनी मिल सके। यही कारण है कि भारत सरकार, ICIMOD, ISRO, और राज्य सरकारें MGNREGA तथा Catch the Rain अभियान के साथ मिलकर हिमालयी वेटलैंड्स की सतत निगरानी और संरक्षण की दिशा में कार्य कर रही हैं।
यदि यह प्रयास समय पर और व्यापक स्तर पर जारी रहे तो हिमालयी वेटलैंड्स जलवायु परिवर्तन से सुरक्षा कवच बनेंगे, करोड़ों लोगों की जल-सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे और जैव विविधता को बचाएंगे; परंतु यदि इन्हें अनदेखा किया गया तो आने वाले दशकों में न केवल प्रवासी पक्षियों और हिमालयी जीवों की प्रजातियाँ विलुप्त होंगी बल्कि गंगा-ब्रह्मपुत्र बेसिन की 70 करोड़ आबादी जल संकट और आपदा के गंभीर खतरे का सामना करेगी।
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