तालाबों का भू-वैज्ञानिक, पर्यावरणीय, सामाजिक और कानूनी महत्व
अजय सहाय
भारत की पारंपरिक जल-संस्कृति में तालाब (पोंड/टैंक) हजारों वर्षों से ग्रामीण जल प्रबंधन का आधार रहे हैं। भारत में औसतन लगभग 4000 BCM (अरब घन मीटर) वर्षा जल हर वर्ष गिरता है, लेकिन इसका बड़ा भाग सतही बहाव के रूप में नदियों से समुद्र में चला जाता है (आँकड़े: Central Water Commission और India Meteorological Department)। इसी कारण प्राचीन भारत में वर्षा जल को रोकने के लिए गाँव-गाँव में तालाब, जोहड़, आहर-पाइन, कुंड और टैंक बनाए गए थे।
कई ऐतिहासिक अध्ययनों के अनुसार स्वतंत्रता से पहले भारत में लगभग 20–24 लाख पारंपरिक तालाब थे जो ग्रामीण सिंचाई, पेयजल और भूजल पुनर्भरण का मुख्य आधार थे। आधुनिक सरकारी आँकड़ों के अनुसार Ministry of Jal Shakti द्वारा जारी Water Bodies Census-2023 में देश में कुल 24,24,540 जलस्रोत दर्ज किए गए हैं, जिनमें से लगभग 14,42,993 (59.5%) तालाब हैं और इनमें से लगभग 97% ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं।
भू-वैज्ञानिक दृष्टि से तालाब अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे वर्षा जल को रोककर धीरे-धीरे जमीन में रिसने देते हैं जिससे भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) होता है। भारत में कुल सिंचाई का लगभग 60–65% और पेयजल का लगभग 85% हिस्सा भूजल से आता है (आँकड़े: Central Ground Water Board)।
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार एक हेक्टेयर क्षेत्रफल का तालाब वर्षा के समय लगभग 30–40 लाख लीटर पानी अस्थायी रूप से संग्रह कर सकता है और इसका लगभग 20–40% भाग धीरे-धीरे aquifer में रिसकर भूजल स्तर को बढ़ाता है। यदि देश के लगभग 14.4 लाख तालाबों की औसत जलधारण क्षमता 10,000–50,000 घन मीटर मानी जाए तो कुल मिलाकर 100–300 BCM पानी तालाबों में संग्रहित किया जा सकता है, जो ग्रामीण जल सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
तालाब जल-चक्र (Hydrological Cycle) को संतुलित रखते हैं और स्थानीय सूक्ष्म-जलवायु (Micro-climate) को भी प्रभावित करते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों में पाया गया है कि बड़े जलस्रोतों के आसपास तापमान आसपास के क्षेत्रों की तुलना में 1–2°C तक कम हो सकता है।
तालाब जैव विविधता के भी महत्वपूर्ण केंद्र हैं—इनमें जलीय पौधे, मछलियाँ, उभयचर और अनेक प्रकार के पक्षी पाए जाते हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी तालाबों का महत्व बहुत बड़ा है क्योंकि वे सिंचाई, मत्स्य पालन और पशुपालन के लिए पानी उपलब्ध कराते हैं।
लेकिन पिछले दशकों में तालाबों के सामने कई बड़ी चुनौतियाँ खड़ी हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या अतिक्रमण (Encroachment) है, जहाँ तालाबों की जमीन पर अवैध निर्माण या खेती कर दी जाती है। दूसरी समस्या सिल्टेशन (गाद भरना) है जिससे तालाब की गहराई और जलधारण क्षमता कम हो जाती है। तीसरी समस्या कचरा और सीवेज प्रदूषण है और चौथी समस्या राजस्व रिकॉर्ड और सीमांकन की कमी है।
तालाबों के संरक्षण को लेकर भारत की न्यायपालिका ने भी महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं। सबसे महत्वपूर्ण निर्णय Hinch Lal Tiwari vs Kamala Devi (वर्ष 2001) में आया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तालाब, झील और अन्य जलस्रोतों की भूमि को किसी भी हालत में आवासीय या व्यावसायिक उपयोग में नहीं बदला जा सकता और जहाँ भी अतिक्रमण हुआ है।
वहाँ से कब्जा हटाकर तालाब को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए। इसी प्रकार Intellectuals Forum vs State of Andhra Pradesh (वर्ष 2006) में सुप्रीम कोर्ट ने Public Trust Doctrine लागू करते हुए कहा कि तालाब, झील और जलस्रोत जनता की संपत्ति हैं और सरकार उनकी संरक्षक (Trustee) है।
उच्च न्यायालयों ने भी तालाब संरक्षण के लिए कई आदेश दिए हैं। Madras High Court ने कई मामलों में तालाबों से अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया। Allahabad High Court ने तालाब की भूमि को निजी पट्टे पर देना अवैध बताया। Patna High Court ने भी प्रशासन को तालाबों का सीमांकन कर अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया।
सरकार ने तालाबों के संरक्षण के लिए कई योजनाएँ भी शुरू की हैं। Ministry of Rural Development द्वारा संचालित महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGA) के तहत तालाब निर्माण और पुनर्जीवन प्रमुख कार्यों में शामिल हैं। इसी प्रकार Ministry of Jal Shakti द्वारा अमृत सरोवर मिशन (2022) के तहत देशभर में 75,000 तालाबों के निर्माण या पुनर्जीवन का लक्ष्य रखा गया है। पर्यावरण संरक्षण के लिए Wetlands (Conservation and Management) Rules-2017 भी महत्वपूर्ण कानूनी ढांचा प्रदान करते हैं।
आज भारत दुनिया में भूजल का सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है। NITI Aayog की रिपोर्ट के अनुसार देश के कई क्षेत्रों में भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है। ऐसे में तालाब वर्षा जल को रोककर भूजल पुनर्भरण का सबसे सस्ता और टिकाऊ समाधान बन सकते हैं। इसलिए विशेषज्ञों का मानना है कि तालाब केवल छोटे जलस्रोत नहीं बल्कि गाँव की जल-जीवन रेखा हैं—वे भूजल recharge करते हैं, बाढ़ को नियंत्रित करते हैं, जैव विविधता को बचाते हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाते हैं।
यदि तालाबों का संरक्षण और पुनर्जीवन किया जाए तो वे भारत को जल संकट से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन यदि अतिक्रमण और उपेक्षा जारी रही तो भविष्य में जल संकट और गंभीर हो सकता है। इसलिए वैज्ञानिक प्रबंधन, सामुदायिक भागीदारी और मजबूत कानूनी संरक्षण के माध्यम से तालाबों को बचाना भारत के जल भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।