साल 2026 के मार्च का पहला सप्ताह एक ऐसी खामोशी लेकर आया है जिसने पर्यावरणविदों और नीति-निर्धारकों की नींद उड़ा दी
पंकज चतुर्वेदी
कश्मीर की वादियों में मार्च का महीना आमतौर पर बर्फ के पिघलने और नदियों के उफनते वेग का प्रतीक होता है। लेकिन साल 2026 के मार्च का पहला सप्ताह एक ऐसी खामोशी लेकर आया है जिसने पर्यावरणविदों और नीति-निर्धारकों की नींद उड़ा दी है। झेलम नदी, जो सदियों से सभ्यता और संस्कृति की संवाहिका रही है, उसका प्रवाह अचानक थम सा गया है।
श्रीनगर के बीचों-बीच सूखी गाद और उभरते पत्थरों का दृश्य केवल एक स्थानीय भौगोलिक परिवर्तन नहीं है, बल्कि यह समूचे उत्तर भारत की जल व्यवस्था के लिए एक खतरे की घंटी है। इस संकट की जड़ें जितनी गहरी हैं, इसके परिणाम उतने ही व्यापक और विनाशकारी हो सकते हैं।
झेलम का उद्गम कश्मीर घाटी के ऊपरी हिस्से में स्थित बेरीनाग से है और यह लीदर घाटी की बर्फ से जल धारा प्राप्त करती है। वूलर झील में मिलने के पूर्व श्रीनगर के बाद इसमें सिंधु नदी मिलती है। बारामूला के नीचे झेलम कश्मीर घाटी को छोड़कर तेज गति से आगे बढ़ती है और गहरी घाटी बनाती हुई पश्चिम की ओर होती हुई मुजफ्फराबाद पहुंचती है, जहां दाईं ओर से आकर किशनगंगा मिलती है।
इसके बाद नदी दक्षिण की ओर कश्मीर और पाकिस्तान की सीमा-रेखा बनाती हुई बहती है और झेलम शहर के उत्तर-पूर्व में पाकिस्तान में प्रवेश करती है। यहां से 322 कि. मी. आगे बहने के बाद तिरमू के पास यह चेनाब में मिल जाती है। स्पष्ट है झेलम पर दोनों देशों के लाखों लोगों की उम्मीदें रहती हैं – खेत के लिए, पेयजल और बिजली परियोजनाओं के लिए ।
मार्च के तीसरे हफ्ते में कुछ बरसात और बर्फबारी हुई है लेकिन नदी के हालत इतने खराब हैं कि यह जल-आवक ऊंट के मुंह में जीरा जैसा है । झेलम सूखने के संकट की जड़ें सर्दियों के दौरान हुई वर्षा और हिमपात की भारी कमी में छिपी हैं। झेलम जैसी नदियाँ मुख्य रूप से बर्फ के पिघलने पर निर्भर करती हैं, और जब पहाड़ों का ‘वाटर बैंक’ ही खाली हो, तो मैदानों में प्रवाह की उम्मीद बेमानी हो जाती है।
लेकिन संकट केवल नदी के सूखने तक सीमित नहीं है; इसका भयावह असर कश्मीर की पहचान मानी जाने वाली डल झील पर भी दिखने लगा है। झेलम में कम होते प्रवाह और पानी की गति थमने के कारण डल झील के बड़े हिस्से अचानक गहरे हरे रंग में तब्दील हो गए हैं ।
स्थानीय निवासी, जो दशकों से इस झील के किनारे रह रहे हैं, बताते हैं कि उन्होंने अपने जीवन में डल का ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा । विशेषज्ञों के अनुसार, जब नदी का इनफ्लो (आवक) कम हो जाता है और पानी स्थिर रहने लगता है, तो पोषक तत्वों (न्यूट्रिएंट्स) का जमाव बढ़ जाता है, जिससे पानी की सतह पर इस तरह के बदलाव दिखाई देते हैं ।
इस सूखे का तात्कालिक कारण सर्दियों के दौरान हिमालयी क्षेत्र में वर्षा और हिमपात की भारी कमी है। कश्मीर की नदियाँ मुख्य रूप से बर्फ के पिघलने पर निर्भर करती हैं।
जब सर्दियों के ‘चिल्लई कलां’ जैसे कठिन समय में पहाड़ों पर बर्फ की परतें नहीं जमीं, तो वसंत के आगमन पर नदियों को मिलने वाला प्राकृतिक भंडार खाली रह गया। यह ‘हिम-ऋण’ अब झेलम के सूखे तल के रूप में हमारे सामने है।
एक पर्यावरण लेखक के रूप में हमें यह समझना होगा कि झेलम का सूखना केवल पानी की कमी नहीं, बल्कि एक संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र के चरमराने का संकेत है।
इसका सबसे पहला और सीधा प्रहार कृषि और खाद्य सुरक्षा पर पड़ेगा। झेलम घाटी के धान के खेत और दक्षिण कश्मीर के विश्व प्रसिद्ध फलों के बागान इसी नदी के जल पर आश्रित हैं।
मार्च और अप्रैल का समय बुवाई और सिंचाई के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। यदि इस समय जल का प्रवाह न्यूनतम रहा, तो इसका असर न केवल उत्पादन पर पड़ेगा, बल्कि भविष्य की फसल सुरक्षा भी अनिश्चित हो जाएगी। कृषि के बाद, ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा संकट हमारे सामने खड़ा है।
भारत की कई महत्वपूर्ण जलविद्युत परियोजनाएं झेलम के बहाव पर टिकी हैं। नदी का स्तर गिरने से बिजली उत्पादन ठप हो सकता है, जिससे पूरे उत्तरी ग्रिड पर दबाव बढ़ेगा और हमें वैकल्पिक, प्रदूषित ऊर्जा स्रोतों की ओर मुड़ने को मजबूर होना पड़ेगा।
जल कूटनीति के नजरिए से भी यह स्थिति अत्यंत संवेदनशील है। सिंधु जल संधि के प्रावधानों के तहत झेलम के पानी का एक बड़ा हिस्सा सीमा पार जाता है, जबकि भारत के पास इसके सीमित उपयोग के अधिकार हैं।
जब प्रकृति की ओर से ही पानी की आवक कम होगी, तो दोनों देशों के बीच संसाधनों के बंटवारे को लेकर तनाव बढ़ना लाजिमी है। ऐसी स्थिति में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक जटिलताएं बढ़ सकती हैं, जो क्षेत्रीय स्थिरता के लिए नई चुनौतियां पेश करेंगी।
इसके साथ ही, शहरी जल जीवन और जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। झेलम का धीमा पड़ता वेग वुलर और डल जैसी विशाल झीलों और आर्द्रभूमियों के अस्तित्व को संकट में डाल रहा है।
इन जल निकायों के सूखने से भूजल स्तर में भारी गिरावट आएगी, जिससे पेयजल का भीषण संकट पैदा होगा। प्रवासी पक्षियों के आवास और जलीय जीवों का विनाश इस त्रासदी का वह मौन अध्याय है जिसे अक्सर विकास की फाइलों में जगह नहीं मिलती।
झेलम की जलधारा का इस तरह मार्च के प्रारंभ में ही मंद पड़ जाना जलवायु परिवर्तन के उस भयावह सच को उजागर करता है जिसे हम अब तक केवल भविष्य की चेतावनी मान रहे थे, असल में वह अब दरवाजे पर दस्तक दे चुका हैं ।
हिमपात के स्वरूप में बदलाव, गर्मी का बढ़ना और चरम मौसमों की मार ने झेलम को सूखा दिया , जबकि अभी बरसात होने में कम से कम आठ महीने बचे हैं । अब समय आ गया है कि हम जल प्रबंधन को लेकर अपनी पुरानी धारणाओं को बदलें। हमें केवल गाद निकालने या नदी के तल को गहरा करने जैसे तात्कालिक उपायों से आगे बढ़कर जलग्रहण क्षेत्रों के संरक्षण पर ध्यान देना होगा।
हिमालयी वनों का अंधाधुंध कटान और अनियोजित निर्माण कार्य इस सूखे के बड़े जिम्मेदार हैं। भविष्य में ऐसी आपदाओं से बचने के लिए हमें जलवायु-अनुकूल कृषि और जल-संचयन की आधुनिक तकनीकों को अपनाना ही होगा।
झेलम का यह सूखा हमारे लिए एक कड़वी चेतावनी है कि यदि हमने प्रकृति के चक्र के साथ खिलवाड़ बंद नहीं किया, तो आने वाले समय में हमारी अन्य नदियाँ भी इसी तरह खामोश हो सकती हैं।
यह समय केवल चिंता करने का नहीं, बल्कि सामूहिक इच्छाशक्ति के साथ ठोस कदम उठाने का है ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियों को सूखी हुई नदियों की विरासत न मिले।