वायुमंडलीय नमी से जल आत्मनिर्भर भारत की ओर एक वैज्ञानिक नवाचार
अजय सहाय
“वर्का वाटर: भारत में वायुमंडलीय जल संग्रहण की एक वैज्ञानिक संभावना और नवाचार” — भारत जैसे देश में जहाँ प्रतिवर्ष औसतन 4000 अरब घन मीटर (BCM) वर्षा होती है, किंतु जल संचयन की संरचनात्मक अक्षमता, वाष्पीकरण, रिसाव, और योजनागत कमजोरियों के कारण उसका लगभग 80% भाग व्यर्थ चला जाता है, वहीं वर्का वाटर जैसी परियोजनाएँ एक वैज्ञानिक और टिकाऊ समाधान बनकर उभर रही हैं जो वायुमंडलीय जल (Atmospheric Water Harvesting) पर आधारित हैं और बिजली या यांत्रिक प्रणाली पर निर्भर नहीं हैं।
यह परियोजना मूलतः इथियोपिया में जल संकट से जूझ रहे समुदायों के लिए डिजाइन की गई थी, परंतु इसके प्राकृतिक संक्षेपण (Condensation) आधारित सिद्धांत और स्थानीय सामग्री से निर्माण की अवधारणा भारत के लिए विशेष रूप से उपयोगी बनती है, विशेषकर राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, लद्दाख, और झारखंड जैसे जल संकटग्रस्त क्षेत्रों में जहाँ भूजल 1000–1500 फीट तक गिर चुका है, तथा जहाँ जल स्रोतों की बहाली में समय और पूंजी दोनों की बड़ी आवश्यकता है।
वर्का वाटर टावर लगभग 10 मीटर ऊँचा होता है जो बांस, बायोप्लास्टिक, रिसाइकल्ड फैब्रिक और मेष जैसे हल्के परंतु मजबूत पदार्थों से तैयार किया जाता है, जो हवा में मौजूद ओस, कोहरा, या आर्द्रता को रात में तापमान गिरने पर संक्षेपित कर जल में परिवर्तित करता है। वैज्ञानिक रूप से यह कार्य वाष्प संचय-संक्षेपण सिद्धांत (vapour condensation principle) पर आधारित है, जहाँ रात की ठंडी सतह पर आर्द्रता जल की बूंदों में परिवर्तित होती है — और यह जल टावर के आधार में स्थित एक संग्रहण टैंक में एकत्र होता है।
औसतन यह संरचना प्रतिदिन 50 से 100 लीटर तक पेय योग्य जल प्रदान कर सकती है, जो एक छोटे ग्रामीण समुदाय या विद्यालय की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु पर्याप्त हो सकता है। भारत के परिप्रेक्ष्य में, यह विशेष रूप से अति शुष्क क्षेत्र, जहाँ रात के तापमान में भारी गिरावट होती है (जैसे लद्दाख में -10°C से नीचे), वहाँ यह संक्षेपण प्रक्रिया और भी प्रभावी हो सकती है।
2023 के बाद भारत के कई तकनीकी संस्थानों जैसे IIT बॉम्बे, IIT मद्रास, IIT गांधीनगर, IIT हैदराबाद, और नीरी (NEERI) जैसे अनुसंधान निकायों ने इस सिद्धांत पर आधारित प्रोटोटाइप सिस्टम विकसित करने शुरू किए हैं, जिनमें स्थानीय सामग्री से तैयार डिजाइन ऑप्टिमाइज़ेशन, अधिकतम सतह क्षेत्र अनुपात, और हवा प्रवाह गतिकी पर विशेष कार्य हुआ है ताकि भारत की विविध जलवायु परिस्थितियों में इसे अधिकतम अनुकूलित किया जा सके।
NIOT (National Institute of Ocean Technology) और CSIR के तहत भी ड्यूल-सोर्स वाटर कलेक्शन प्रणाली पर अध्ययन चल रहे हैं जिसमें वर्का वाटर संरचना को रेनवाटर कलेक्टर, कूलिंग पोंड, और वनस्पति आधारित नमी संग्रह प्रणाली से जोड़ा जा रहा है। नीति आयोग की 2024 की “विकेन्द्रित जल नवाचार रिपोर्ट” में वर्का वाटर को सस्टेनेबल और ऑफ-ग्रिड जल स्रोत के रूप में मान्यता दी गई है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ 500 से अधिक गांवों को 3–5 किलोमीटर दूर से जल लाना पड़ता है।
इसके अतिरिक्त स्वच्छ भारत मिशन, अमृत 2.0, और जल जीवन मिशन जैसे कार्यक्रमों के अंतर्गत भारत सरकार ने वर्का वाटर जैसे प्रणाली पर पायलट प्रोजेक्ट आरंभ किए हैं — जैसे राजस्थान के पाली जिले में बिश्नोई समुदाय के साथ, लद्दाख के द्रास सेक्टर में सेना के आउटपोस्ट हेतु, और झारखंड के दुमका जिले के वनवासी स्कूलों में। इस प्रणाली की सबसे बड़ी वैज्ञानिक विशेषता यह है कि यह शून्य कार्बन उत्सर्जन, न्यूनतम रख-रखाव, और ग्रामीण समुदायों द्वारा स्वयं निर्माण एवं संचालन योग्य है।
इसकी औसतन निर्माण लागत ₹75,000 से ₹1.5 लाख के बीच आती है, और यदि MGNREGA जैसी योजना के अंतर्गत इसे स्थापित किया जाए तो स्थानीय आजीविका सृजन, महिला सशक्तिकरण, और जल आत्मनिर्भर ग्राम पंचायत की दिशा में यह क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती है। वर्तमान में भारत में लगभग 2.48 लाख ऐसे गांव हैं जहाँ भूजल स्तर 30 मीटर से नीचे चला गया है, और यदि प्रत्येक गांव में एक वर्का वाटर संरचना स्थापित की जाए तो यह प्रतिदिन 2.48 करोड़ लीटर जल का वैकल्पिक स्रोत बन सकता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से यह भी देखा गया है कि यदि इन संरचनाओं को मियावाकी वन, वेटलैंड फ्रिंज ज़ोन, या छोटे भू-आर्द्र क्षेत्रों के साथ समन्वित किया जाए तो ये स्थानीय नमी प्रतिधारण क्षमता को बढ़ाकर संरचना की दक्षता में 30% तक वृद्धि कर सकते हैं। आईआईटी गुवाहाटी द्वारा किया गया एक 2024 का शोध बताता है कि यदि वर्का वाटर संरचना की बाहरी सतह को हीलियम-कोटेड ताप-विरोधी पदार्थ से तैयार किया जाए, तो यह गर्म दिन में भी 20–30% अधिक जल संक्षेपण कर सकती है।
इस तरह, भारत के संदर्भ में वर्का वाटर एक मात्र नवाचार नहीं, बल्कि एक समावेशी, तकनीकी, पर्यावरणीय और सामाजिक समाधान के रूप में उभर सकता है जो न केवल जल संकट को हल करता है, बल्कि जलवायु अनुकूलन, स्थानीय रोजगार, महिला भागीदारी, और सामाजिक स्वामित्व को भी प्रोत्साहित करता है — जिससे जल आत्मनिर्भर भारत 2047 की संकल्पना साकार हो सकती है।