राज्यों में भी जल विभागों का समन्वय न होना
अजय सहाय
भारत को हर वर्ष औसतन 4000 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) वर्षा जल प्राप्त होता है, जो वैश्विक स्तर पर भारत को जल संसाधनों के मामले में एक समृद्ध देश बनाता है, लेकिन इसके बावजूद देश आज भी गहन जल संकट से जूझ रहा है, जिसका प्रमुख कारण यह है कि इस वर्षा जल में से मात्र 690–800 BCM जल ही प्रभावी रूप से संरक्षित या उपयोग में लाया जा पाता है और शेष लगभग 3200 BCM जल बर्बाद हो जाता है—यह जल या तो सतही बहाव के माध्यम से समुद्र में चला जाता है, या वाष्पीकरण में व्यर्थ हो जाता है, या फिर नगरीय अव्यवस्था और नीति की असफलता के कारण प्रदूषित होकर अनुपयोगी बन जाता है।
स्वतंत्रता के बाद केंद्र एवं राज्य सरकारों की जल नीति में अनेक वैज्ञानिक और संरचनात्मक कमजोरियाँ रही हैं। 1950 के दशक में जब भारत ने सिंचाई और बांध निर्माण को प्राथमिकता दी, तब वर्षा जल संचयन की समेकित रणनीति नहीं अपनाई गई, जबकि 1960 के दशक में हरित क्रांति ने नलकूप आधारित सिंचाई प्रणाली को प्रोत्साहित किया जिससे भूजल दोहन अत्यधिक बढ़ा लेकिन जल पुनर्भरण की योजना पीछे रह गई।
जल आयोग की रिपोर्टों के अनुसार भारत की कुल भौगोलिक वर्षा क्षमता 4000 BCM है, जिसमें से 1869 BCM सतही जल के रूप में नदियों में बहता है, 432 BCM भूजल पुनर्भरण में उपयोग होता है, 800–1000 BCM वाष्पीकरण में चला जाता है, 75–80 BCM वेटलैंड्स में, 90–100 BCM वन क्षेत्रों में, 80–100 BCM पारंपरिक जल स्रोतों (तालाब, कुएँ, आहर-पईन आदि) में, 20–25 BCM वर्षा जल संचयन संरचनाओं में, और मात्र 10–15 BCM सोख गड्ढों में सुरक्षित हो पाता है। नीति आयोग (NITI Aayog) की 2018 की जल रिपोर्ट ‘Composite Water Management Index’ के अनुसार भारत की 21 प्रमुख राजधानी शहरें 2030 तक शून्य भूजल स्तर की ओर अग्रसर हैं, और वर्षा जल संरक्षण की योजनाएँ कागजों तक सीमित हैं।
73 वर्षों में केंद्र सरकारों द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए लाखों हैंडपंप लगाए गए, लेकिन उनके साथ recharge सिस्टम विकसित नहीं किया गया, जिससे भूजल का स्थायी संतुलन बिगड़ गया। राज्यों में भी जल विभागों का समन्वय न होना, नगरीय निकायों की असमर्थता, वैज्ञानिक संस्थानों और पंचायतों के बीच समन्वय की कमी, तथा नागरिक स्तर पर जल संरक्षण के लिए प्रशिक्षण और जागरूकता की कमी ने इस संकट को और गहरा किया।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो भारत के पास वर्षा जल को संरक्षित करने की 4 प्रमुख वैज्ञानिक पद्धतियाँ थीं—(1) Recharge Trenches (2) Rooftop Rainwater Harvesting (3) Check Dams (4) Traditional Pond Revitalization—परंतु इन पर सतत दीर्घकालिक निवेश न होने से देश आज भी केवल 20% वर्षा जल का संरक्षण कर पा रहा है।
भारत में हर वर्ष लगभग 500 BCM वर्षा जल केवल शहरी सतहों से बह जाता है, क्योंकि वहाँ पर सीवेज सिस्टम के साथ जल संग्रहण की कोई रणनीति नहीं है। केंद्र सरकार की ‘अटल भूजल योजना’ (Atal Bhujal Yojana), ‘जल शक्ति अभियान’, और ‘कैच द रेन’ जैसे कार्यक्रमों में प्रारंभिक सफलता के बावजूद राज्यों की धीमी क्रियान्वयन प्रणाली ने इन्हें ज़मीन पर प्रभावी नहीं बनाया। उदाहरण के लिए, 2020–2023 के बीच बिहार सरकार की ‘जल जीवन हरियाली’ योजना के तहत लगभग 2.39 लाख नए जल निकाय बनाए गए, लेकिन पूरे देश में इस तरह के कार्य एकरूपता से नहीं हुए।
पर्यावरण मंत्रालय की 2021 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 13.5 करोड़ घरों में से केवल 2.7 करोड़ घरों में ही rooftop rainwater harvesting प्रणाली है, और उनमें से भी 30% प्रणाली रख-रखाव की कमी के कारण अनुपयोगी हो चुकी है। भारतीय मौसम विभाग, ISRO, और CGWB (Central Ground Water Board) जैसी वैज्ञानिक संस्थाओं ने भी स्पष्ट किया है कि यदि 4000 BCM वर्षा जल में से 50% भी संरक्षित किया जाए तो भारत 2047 तक जल आत्मनिर्भर राष्ट्र बन सकता है, लेकिन इसके लिए नीति निर्माण में पारदर्शिता, जल डेटा साझा करना, पंचायतों को जल प्रबंधन में अधिकार देना, और प्रत्येक गाँव-शहर में rainwater budget लागू करना आवश्यक है।
जल नीति में एक और गंभीर कमी यह रही कि जल को एक सामाजिक-सांस्कृतिक अधिकार के रूप में देखा गया, वैज्ञानिक दृष्टि से संसाधन प्रबंधन नहीं किया गया। विश्व बैंक की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में जल संकट से हर वर्ष लगभग 6% GDP का नुकसान होता है, जोकि वर्षा जल की बर्बादी से जुड़ी नीति विफलताओं की सीधी देन है। यदि प्रत्येक गाँव में औसतन 10 recharge trench, 10 soakpit, 5 check dam और प्रत्येक घर में rooftop harvesting लगे तो भारत 3200 BCM बर्बाद हो रहे जल में से कम से कम 1500 BCM जल संरक्षित कर सकता है।
इसके लिए सरकार को MGNREGA जैसी योजनाओं के माध्यम से वृहद जल संरक्षण अभियान चलाना होगा जिसमें trenching, wetland restoration, pond renovation, canal cleaning, forest water catchment जैसे कार्यों को एकीकृत किया जाए। दुर्भाग्य से अभी तक भारत में जल को एक राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया गया, न ही राष्ट्रीय जल संसद जैसी कोई संस्था बनी जहाँ जल नीति की समीक्षा हो। 2024 में CGWB के अनुसार भारत के 70% जिलों में भूजल स्तर 5–25 मीटर नीचे चला गया है।
नीति और योजना की यह असफलता मात्र तकनीकी नहीं, बल्कि प्रणालीगत लापरवाही और बहुस्तरीय समन्वयहीनता का परिणाम है। यदि जल को संविधान की सातवीं अनुसूची की समवर्ती सूची (Concurrent List) में लाया जाए और जल नियमन के लिए एक स्वतंत्र ‘राष्ट्रीय जल आयोग’ (National Water Regulatory Authority) की स्थापना की जाए तो 2047 तक भारत 70% वर्षा जल का संरक्षण कर सकता है।
वर्तमान में भारत को हर वर्ष 3200 BCM वर्षा जल बर्बादी के कारण पर्यावरणीय असंतुलन, पेयजल संकट, कृषि में सिंचाई संकट, और शहरी बाढ़ जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, और यह सब स्वतंत्रता के पश्चात जल नीति की उस कमी के कारण हुआ जहाँ हमने वर्षा जल को “प्राकृतिक सौगात” मानकर उसकी बर्बादी को नजरअंदाज किया।
भविष्य में यदि भारत को जल आत्मनिर्भर बनना है तो वर्षा जल संरक्षण को सिर्फ तकनीकी समाधान नहीं, बल्कि एक राष्ट्रव्यापी वैज्ञानिक आंदोलन बनाना होगा जहाँ हर नागरिक, हर पंचायत, हर स्कूल और हर शहर अपने क्षेत्र का ‘जल बजट’ बनाए और 4000 BCM वर्षा जल में से कम से कम 2000–2500 BCM जल हर वर्ष संरक्षित किया जाए ताकि नदियाँ पुनर्जीवित हों, भूजल स्तर संतुलित हो, और भारत एक जल समृद्ध राष्ट्र के रूप में 2047 में स्वतंत्रता के 100 वर्ष पूरे होने पर जल के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भर हो सके।